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Smart Meter पर बढ़ा विवाद, योगी सरकार की जांच शुरू; निष्पक्षता पर उठे सवाल

Smart Meter
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Smart Meter : उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर को लेकर चल रहे विवाद के बीच सरकार ने इसकी तकनीकी जांच तेज कर दी है। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के निर्देश पर पावर कॉरपोरेशन ने चार सदस्यीय टीम बनाई है, जिसने अब सैंपल स्मार्ट मीटर विभागीय लैब भेजने का फैसला लिया है। शनिवार को इन मीटरों को जांच के लिए प्रयोगशाला में भेजा गया, जहां समिति की मौजूदगी में उनकी तकनीकी पड़ताल की जाएगी।

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दरअसल, पावर कॉरपोरेशन ने 12 अप्रैल को इस जांच समिति का गठन किया था और इसे 10 दिन में रिपोर्ट देने का लक्ष्य दिया गया था। हालांकि तय समय बीतने के बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी है।

Smart Meter पर बढ़ा विवाद

इससे साफ है कि मामला जितना आसान समझा जा रहा था, उतना है नहीं। अब विभागीय लैब में होने वाली जांच से ही आगे की तस्वीर साफ होने की उम्मीद जताई जा रही है। इधर, राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिषद के अध्यक्ष Avadhesh Kumar Verma का कहना है कि विभागीय लैब में जांच की निष्पक्षता पर संदेह है। उनका आरोप है कि स्मार्ट मीटर परियोजना से जुड़े कंपनियों और उद्योगपतियों का प्रभाव जांच को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में पारदर्शिता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।

जांच पर उठी शंका

परिषद ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या विभागीय लैब में मीटर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों की पूरी तरह निष्पक्ष जांच संभव है। इसके अलावा यह भी पूछा गया है कि जिन कंपोनेंट्स को बिजली कंपनियों ने मंजूरी दी, उनकी गुणवत्ता और स्रोत की जांच कौन करेगा। परिषद ने सरकार से इस पूरे सिस्टम की स्पष्ट जानकारी देने की मांग की है। उपभोक्ता परिषद ने यह भी जानना चाहा है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने से पहले किन-किन स्तरों पर परीक्षण किए गए थे और उनके नतीजे क्या थे। उनका कहना है कि अगर पहले ही सही तरीके से जांच होती, तो आज इस तरह के विवाद खड़े नहीं होते। अब लोगों का भरोसा बहाल करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

कई जिलों में विरोध प्रदर्शन तेज

स्मार्ट मीटर को लेकर प्रदेश के कई जिलों में विरोध प्रदर्शन भी बढ़ते जा रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग, खासकर महिलाएं, सड़कों पर उतरकर इसका विरोध कर रही हैं। उपभोक्ताओं की मांग है कि उन्हें प्रीपेड और पोस्टपेड मीटर में से चुनने का अधिकार दिया जाए। उनका कहना है कि बिना विकल्प के इस सिस्टम को लागू करना ठीक नहीं है। फिलहाल, सबकी नजर जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हुई है। अगर जांच पारदर्शी और संतोषजनक रही, तो विवाद थम सकता है, लेकिन अगर सवाल बने रहे, तो यह मुद्दा और बड़ा रूप ले सकता है। ऐसे में सरकार के लिए यह सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि भरोसे का भी मामला बन चुका है।

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