Mobile : एक समय था जब गत्ते के बोर्ड, पासे और गोटियां हमारे बचपन का सबसे अहम हिस्सा होते थे। घर में दोस्तों या परिवार के साथ बैठकर खेलना सिर्फ टाइमपास नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ने का जरिया भी था। लेकिन अब तकनीक के दौर में वही खेल मोबाइल स्क्रीन में सिमटकर रह गए हैं। Ludo हर घर का सबसे लोकप्रिय खेल हुआ करता था।
चार रंगों की गोटियां और पासे के साथ खेला जाने वाला यह गेम अब मोबाइल ऐप Ludo King में बदल चुका है। अब पासा फेंकने के लिए सिर्फ स्क्रीन पर टैप करना होता है, लेकिन असली खेल वाली खुशी कहीं पीछे छूट गई है।
Mobile में सिमट गया बचपन
Snakes and Ladders में 99 पर सांप के काटने का दुख और सीढ़ी चढ़ने की खुशी आज भी याद आती है। पहले यह खेल लूडो बोर्ड के पीछे छपा होता था और हर उम्र के लोग इसे खेलते थे। अब इसके डिजिटल वर्जन में ग्राफिक्स तो बेहतर हैं, लेकिन असली मजा महसूस नहीं होता। Carrom खेलते समय बोरिक पाउडर की खुशबू और स्ट्राइकर की आवाज एक अलग ही माहौल बनाती थी। उंगलियों से स्ट्राइकर मारना और ‘रानी’ को पॉकेट में डालना एक कला मानी जाती थी। आज वही कैरम मोबाइल स्क्रीन पर स्वाइप करके खेला जाता है, लेकिन उस एहसास की कमी साफ दिखती है।
जीरो-काटा भी हुआ डिजिटल
Tic Tac Toe यानी जीरो-काटा स्कूल के दिनों का सबसे आसान और मजेदार खेल था। कॉपी के पीछे के पन्नों पर इसे खेलना हर बच्चे की आदत थी। अब इसके लिए भी लोग मोबाइल ऐप का सहारा लेने लगे हैं, जिससे खेल का असली मजा कम हो गया है। ताश के पत्तों के साथ बैठकर रम्मी या अन्य कार्ड गेम खेलना परिवार की शाम का हिस्सा होता था। अब इसकी जगह मोबाइल गेम्स ने ले ली है। लोग अकेले ही अपने फोन में कार्ड गेम खेलते हैं, जिससे सामूहिक खेल का मजा खत्म होता जा रहा है।
रिश्तों की गर्माहट हुई कम
पहले खेल के दौरान घर में हंसी, शोर और बातचीत का माहौल होता था। हार-जीत पर नोकझोंक और फिर हंसी-मजाक रिश्तों को मजबूत बनाते थे। अब हर कोई अपने फोन में व्यस्त रहता है, जिससे वह जुड़ाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।पहले खेलते समय एक-दूसरे को देखकर हंसना, इशारे करना या मजाक करना आम बात थी। अब नजरें सिर्फ मोबाइल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं। इससे लोगों के बीच का सीधा संपर्क कम हो गया है।
यह सच है कि डिजिटल गेम्स ने खेल को आसान और सुलभ बना दिया है। अब हम कहीं से भी किसी के साथ खेल सकते हैं। लेकिन इस सुविधा के बीच हमने वो छोटी-छोटी खुशियां खो दी हैं, जो असली खेलों में मिलती थीं। यही वजह है कि बचपन के वे खेल आज भी यादों में जिंदा हैं।
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