Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मृतक आश्रित कोटे से राशन दुकान के आवंटन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को केवल इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसका विवाह हो चुका है। न्यायालय ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है और वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव उचित नहीं है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने प्रतापगढ़ निवासी रीना देवी पटेल की याचिका पर सुनाया। रीना देवी के पिता राज बहादुर पटेल उचित दर की दुकान का संचालन करते थे। उनके निधन के बाद रीना देवी ने मृतक आश्रित के रूप में उसी दुकान के आवंटन के लिए आवेदन किया था।
Allahabad High Court
रानीगंज के उपजिलाधिकारी (एसडीएम) ने 21 जनवरी 2026 को रीना देवी का आवेदन यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि वह विवाहित बेटी हैं, इसलिए मृतक आश्रित कोटे के तहत दुकान पाने की पात्र नहीं हैं। इसके बाद उन्होंने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। रीना देवी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि केवल विवाहित होने के आधार पर बेटी को मृतक आश्रित लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी बताया कि वह अपने पिता पर आश्रित थीं और योजना के तहत निर्धारित अन्य सभी पात्रता शर्तों को भी पूरा करती हैं।
सरकार ने रखी दलील
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि विवाहित बेटी आवेदन करने की पात्र हो सकती है, लेकिन उसे स्थानीय निवासी होने, मृतक पर आश्रित होने, परिवार के अन्य वयस्क सदस्यों की अनापत्ति और योजना की अन्य आवश्यक शर्तों का पालन करना होगा। यदि ये सभी शर्तें पूरी होती हैं, तभी आवेदन पर विचार किया जा सकता है। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल विवाहित होने के आधार पर बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार के विपरीत है। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि विवाहित बेटी मृतक पर आश्रित थी, स्थानीय निवासी है और सभी निर्धारित शर्तें पूरी करती है, तो उसे भी मृतक आश्रित कोटे के तहत उचित दर की दुकान के आवंटन के लिए पात्र माना जाएगा।
SDM का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने रानीगंज के एसडीएम द्वारा 21 जनवरी 2026 को जारी आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही मामले को दोबारा विचार के लिए संबंधित एसडीएम के पास भेजते हुए निर्देश दिया कि अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत होने की तारीख से दो महीने के भीतर कानून के अनुसार नया निर्णय लिया जाए।
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