UCC Politics : भारतीय राजनीति में 2029 की लड़ाई से पहले एक ऐसा मुद्दा फिर केंद्र में आ गया है, जो सत्ता पक्ष के पुराने एजेंडे का हिस्सा रहा है और जिस पर सहयोगी दलों की अपनी-अपनी सियासी मजबूरियां भी हैं। केंद्र में बीजेपी अपने दम पर लोकसभा के बहुमत के आंकड़े से नीचे है और सरकार एनडीए सहयोगियों के समर्थन से चल रही है। इसके बावजूद यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी यूसीसी पर पार्टी ने बड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी-एनडीए की सरकार वाले सभी 21 राज्यों में यूसीसी लागू किया जाएगा।
उत्तराखंड पहले ही इसे लागू कर चुका है और दूसरे राज्यों में भी इसे लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ी है। अब असली सियासी सवाल सहयोगियों के रुख पर टिक गया है। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी समर्थन की तरफ बढ़ी है, जबकि बिहार में जेडीयू ने बिना प्रावधान देखे कोई जल्दबाजी करने से इनकार किया है।
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यूसीसी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों के लिए समान कानूनी व्यवस्था की बात करता है। इनसे जुड़े कई विषय संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए केंद्र के साथ राज्य भी कानून बना सकते हैं। यही वजह है कि बीजेपी की रणनीति फिलहाल राज्य-दर-राज्य आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड इस व्यवस्था को लागू करने वाला पहला राज्य बन चुका है। एनडीए के प्रमुख सहयोगियों में शामिल टीडीपी का रुख इस पूरे मामले में अहम है। लोकसभा में पार्टी के नेता लावु श्री कृष्ण देवरायालु ने कहा है कि टीडीपी यूसीसी का समर्थन करेगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसे अपनाने से पहले अलग-अलग पक्षों से बातचीत की जाएगी। इससे साफ है कि टीडीपी समर्थन तो दे रही है, लेकिन सामाजिक और धार्मिक पक्षों से चर्चा का रास्ता भी खुला रखना चाहती है।
आंध्र में अभी जमीन पर लंबा रास्ता
टीडीपी के समर्थन के बावजूद आंध्र प्रदेश में यूसीसी को लागू करने की प्रक्रिया तत्काल आगे बढ़ती नहीं दिख रही। पार्टी की ओर से बातचीत और सभी संबंधित पक्षों की राय लेने पर जोर दिया गया है। चंद्रबाबू नायडू इससे पहले भी मुस्लिम समुदाय के हितों को लेकर अपनी स्थिति जाहिर करते रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय गठबंधन की राजनीति और आंध्र प्रदेश के स्थानीय सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन टीडीपी के लिए अहम रहेगा।
जेडीयू ने संभलकर बढ़ाए कदम
सबसे ज्यादा निगाह बिहार पर है। जेडीयू ने फिलहाल यूसीसी पर सीधे समर्थन या पूर्ण विरोध की जगह कानून का प्रारूप देखने की बात कही है। बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि पार्टी पहले प्रावधानों का अध्ययन करेगी और यदि कोई आपत्तिजनक बात नहीं हुई तो सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं करेगी। जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के अमित शाह से इस मुद्दे पर बातचीत करने की भी बात सामने आई है। जेडीयू लंबे समय से यूसीसी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक सहमति और अलग-अलग समुदायों से बातचीत की जरूरत बताती रही है। इसलिए बिहार में पार्टी क्या फैसला करती है, यह केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल पार्टी ने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है, लेकिन जल्दबाजी से दूरी जरूर बनाई है।
2029 से पहले बड़ा सियासी इम्तिहान
अमित शाह की घोषणा ने साफ कर दिया है कि यूसीसी आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बना रहेगा। बीजेपी इसे अपने पुराने वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के तौर पर पेश कर रही है, जबकि विपक्ष और एनडीए के कुछ सहयोगी प्रक्रिया, सहमति और सामाजिक प्रभाव से जुड़े सवाल उठा रहे हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि 21 एनडीए शासित राज्यों में कितने राज्य वास्तव में कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं और गठबंधन के भीतर अलग-अलग रुख के बीच बीजेपी किस तरह तालमेल बनाती है।
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