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UP Politics: बांसडीह में किसके सिर सजेगा टिकट का ताज, केतकी सिंह बनाम सपा की विरासत में कई दावेदार

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UP Politics : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हों, लेकिन बलिया की बांसडीह सीट पर सियासी बिसात अभी से बिछती दिखाई दे रही है। कभी बयान तो कभी चुनावी समीकरण, बांसडीह की राजनीति हमेशा प्रदेश की चर्चित सीटों में गिनी जाती रही है। 2022 में बीजेपी ने यहां ऐसा उलटफेर किया था, जिसने दशकों पुराने सियासी समीकरणों को हिला दिया। केतकी सिंह ने समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता और तीन बार के विधायक रामगोविंद चौधरी को हराकर पहली बार इस सीट पर बीजेपी का कमल खिलाया था। अब 2027 की तैयारी के साथ सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी एक बार फिर केतकी सिंह पर भरोसा जताएगी या टिकट की दौड़ में शामिल दूसरे चेहरों में से किसी को मौका मिलेगा।

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उधर रामगोविंद चौधरी की खराब सेहत के बीच सपा में भी नेतृत्व और टिकट को लेकर चर्चाएं तेज हैं। उनके बेटे रंजीत चौधरी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। ऐसे में बांसडीह में मुकाबला सिर्फ पार्टियों का नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत, संगठन और स्थानीय प्रभाव का भी बनता नजर आ रहा है।

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2022 की जीत ने केतकी सिंह को बीजेपी की राजनीति में मजबूत स्थिति दिलाई। उन्होंने सपा के पुराने गढ़ में सेंध लगाते हुए पार्टी को पहली बार विधानसभा चुनाव में जीत दिलाई। क्षेत्र में उनकी सक्रियता और बेबाक अंदाज लगातार चर्चा में रहते हैं। यही वजह है कि 2027 के लिए उनकी दावेदारी को फिलहाल मजबूत माना जा रहा है। हालांकि अंतिम फैसला बीजेपी नेतृत्व को करना है। बांसडीह सीट पर बीजेपी के अंदर भी टिकट के लिए दावेदारों की कमी नहीं है। 2007 में बसपा के टिकट पर विधायक रह चुके शिवशंकर चौहान अब बीजेपी में हैं और अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। वहीं एनडीए के सहयोगी दल निषाद पार्टी से अजय शंकर पांडे उर्फ कनक पांडे और संजय सिंह के नाम भी चर्चा में हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की ओर से प्रदेश प्रवक्ता सुनील सिंह को बांसडीह का प्रभारी बनाए जाने के बाद उनकी संभावित दावेदारी की चर्चा भी बढ़ी है।

नए चेहरे की लड़ाई

बांसडीह समाजवादी पार्टी के लिए लंबे समय से अहम सीट रही है। रामगोविंद चौधरी यहां तीन बार विधायक रहे हैं और क्षेत्र में उनका मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता है। उनकी अस्वस्थता के बाद अब सवाल यह है कि सपा नेतृत्व इस सीट पर पुराने राजनीतिक परिवार की विरासत को आगे बढ़ाएगा या किसी नए चेहरे पर भरोसा करेगा। अखिलेश यादव का रामगोविंद चौधरी से मिलना भी इस लिहाज से राजनीतिक तौर पर चर्चा का विषय बना है। रामगोविंद चौधरी के बेटे रंजीत चौधरी को सपा के संभावित दावेदारों में सबसे आगे माना जा रहा है। माना जा रहा है कि पार्टी अगर परिवार की राजनीतिक विरासत को जारी रखने का फैसला करती है तो रंजीत चौधरी स्वाभाविक विकल्प हो सकते हैं। हालांकि अभी टिकट को लेकर कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।

सपा में इन चेहरों ने भी ठोकी ताल

रंजीत चौधरी के अलावा सहतवार नगर पंचायत के चेयरमैन प्रतिनिधि नीरज सिंह गुड्डू भी टिकट की दौड़ में हैं। वह लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय होने का दावा करते हैं। आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देकर सपा में आए सुशांत राज पाठक का नाम भी दावेदारों में है। मनियर क्षेत्र के पूर्व जिला पंचायत सदस्य विजय यादव भी सपा से टिकट की मांग कर रहे हैं। बांसडीह में कांग्रेस के पुराने प्रभाव को देखते हुए पार्टी की तरफ से भी दावेदारी सामने आ रही है। स्वर्गीय बच्चा पाठक के परिवार की ओर से टिकट की मांग किए जाने की चर्चा है। दूसरी ओर बसपा भी इस सीट को नजरअंदाज नहीं कर सकती। पूर्व में यहां पार्टी जीत हासिल कर चुकी है। सुरेंद्र निषाद और सेवानिवृत्त राजस्व कानूनगो निर्भय नारायण सिंह के नाम बसपा की संभावित दावेदारी में बताए जा रहे हैं।

बांसडीह का अगला समीकरण

बांसडीह में 2027 का चुनाव कई स्तरों पर दिलचस्प होने वाला है। बीजेपी के सामने 2022 की जीत दोहराने की चुनौती होगी, जबकि सपा के सामने पुराने प्रभाव को वापस मजबूत करने का सवाल रहेगा। एनडीए के सहयोगी दलों की दावेदारी और बसपा-कांग्रेस की मौजूदगी मुकाबले को और पेचीदा बना सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि बीजेपी और सपा जैसे बड़े दल किस चेहरे पर दांव लगाते हैं, क्योंकि टिकट का फैसला ही बांसडीह के अगले सियासी मुकाबले की दिशा काफी हद तक तय कर सकता है।

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