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Nirjala Ekadashi पर 1008 कलशों से हुआ बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक, हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठी काशी

Nirjala Ekadashi 2026 : निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर वाराणसी में आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। गुरुवार सुबह हजारों शिवभक्त राजेंद्र प्रसाद घाट से गंगाजल लेकर काशी विश्वनाथ धाम के लिए रवाना हुए। “हर-हर महादेव” के जयघोष और धार्मिक उत्साह के बीच निकली इस भव्य यात्रा में श्रद्धालुओं ने 1008 कलशों के जल से बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक किया। धाम पहुंचने के बाद विधि-विधान से रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना संपन्न हुई। इस धार्मिक आयोजन की खास बात यह रही कि यात्रा में केवल गंगाजल ही नहीं, बल्कि देश की कई प्रमुख नदियों का पवित्र जल भी शामिल किया गया।

झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और गोदावरी सहित काशी, हरिद्वार और ऋषिकेश से लाए गए जल से भरे 11 रजत कलश यात्रा का प्रमुख आकर्षण बने। श्रद्धालु इन कलशों को लेकर सबसे आगे चल रहे थे और पूरे मार्ग में भक्ति गीतों तथा मंत्रोच्चार का वातावरण बना रहा।

Nirjala Ekadashi

करीब दो किलोमीटर लंबी इस कलश यात्रा में भगवान शिव और माता पार्वती के स्वरूप में सजे कलाकारों ने विशेष आकर्षण बिखेरा। नरमुंडों की माला धारण किए कलाकारों ने धार्मिक संगीत की धुन पर नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे देखने के लिए रास्ते भर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। श्रद्धालुओं ने जगह-जगह पुष्पवर्षा कर यात्रा का स्वागत किया। काशी के विभिन्न इलाकों से बड़ी संख्या में महिलाएं पीली साड़ी पहनकर इस धार्मिक आयोजन में शामिल हुईं। उन्होंने मिट्टी के कलशों में गंगाजल भरकर निर्जला व्रत के साथ बाबा विश्वनाथ को अर्पित करने का संकल्प लिया। महिलाओं की मौजूदगी और श्रद्धा ने पूरे आयोजन को और अधिक भव्य बना दिया।

धार्मिक महत्व

सनातन परंपरा में निर्जला एकादशी को सबसे कठिन और पुण्यदायी व्रतों में माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। साथ ही भगवान शिव को पवित्र नदियों का जल अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। निर्जला एकादशी पर श्रद्धालु सूर्योदय से पहले स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, कथा श्रवण और दान-पुण्य किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार द्वादशी तिथि तक जल और अन्न का त्याग कर किया गया यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। काशी में आयोजित यह भव्य जलाभिषेक और कलश यात्रा इसी अटूट आस्था और सनातन परंपरा का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई।

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