Labor Day : ऊंची इमारतों से लेकर खेतों की हरियाली तक, हमारे आसपास दिखने वाली हर चीज किसी न किसी मजदूर की मेहनत का नतीजा है। इंसानी सभ्यता की शुरुआत से ही श्रम ने विकास की दिशा तय की है। चाहे कुम्हार के हाथों की कारीगरी हो या किसान की खेती, हर क्षेत्र में मजदूर समाज की रीढ़ बना हुआ है। आज की आधुनिक दुनिया में भी यह सच्चाई जस की तस है कि बिना श्रम के प्रगति की कल्पना अधूरी है।
आज 8 घंटे की नौकरी सामान्य लगती है, लेकिन इसके पीछे लंबा संघर्ष छिपा है। 19वीं सदी के औद्योगिक दौर में मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता था। इसके खिलाफ 1 मई 1886 को Chicago में बड़ा आंदोलन हुआ।
Labor Day
मजदूरों की मांग काम, आराम और निजी जीवन के लिए बराबर समय थी। आंदोलन के दौरान हुई हिंसा ने दुनिया का ध्यान मजदूरों की हालत पर खींचा और यहीं से श्रमिक अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा मिली। भारत में भी मजदूरों ने अपने हक के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। अंग्रेजी शासन के दौरान शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए 1920 में All India Trade Union Congress का गठन हुआ। इसके बाद 1 मई 1923 को Chennai में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया। आजादी के बाद सरकार ने न्यूनतम मजदूरी, औद्योगिक विवाद और भविष्य निधि जैसे कानून बनाकर श्रमिकों को सुरक्षा देने की कोशिश की, हालांकि असंगठित क्षेत्र आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
बदलते दौर में नई मुश्किलें
तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने रोजगार के स्वरूप को बदल दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के कारण पारंपरिक नौकरियां कम हो रही हैं, जबकि गिग इकॉनमी तेजी से बढ़ रही है। डिलीवरी, कैब सर्विस और फ्रीलांस काम में लोगों को लचीलापन तो मिलता है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा का अभाव बना रहता है। ऐसे में मजदूरों के अधिकारों को नए सिरे से समझने और सुरक्षित करने की जरूरत बढ़ गई है।
महामारी ने दिखाई सच्चाई
कोरोना काल में जब लाखों प्रवासी मजदूर अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर हुए, तब देश ने उनकी असल स्थिति को करीब से देखा। इस दौर ने यह साफ कर दिया कि मजबूत सामाजिक सुरक्षा के बिना श्रमिक वर्ग सबसे ज्यादा असुरक्षित रहता है। यह घटना नीति-निर्माताओं के लिए भी एक बड़ा सबक साबित हुई। मजदूर केवल उत्पादन का हिस्सा नहीं, बल्कि विकास की असली ताकत हैं। जब तक उन्हें सम्मान, उचित वेतन और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक विकास अधूरा रहेगा। मजदूर दिवस सिर्फ जश्न का दिन नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का मौका है कि मेहनतकश वर्ग के अधिकारों की रक्षा करना समाज की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
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