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Bhojshala Case पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, परमारकालीन निर्माण के मिले प्रमाण; खुले कई राज

Bhojshala Case : मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद पर शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पुरातात्विक तथ्यों का निर्धारण अनुमान से नहीं बल्कि वैज्ञानिक जांच और बहु-विषयी अध्ययन से होता है। अदालत ने अपने फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की विस्तृत रिपोर्ट को आधार बनाते हुए स्पष्ट किया कि परिसर के मूल स्वरूप से जुड़े कई प्रमाण मंदिर स्थापत्य और हिंदू धार्मिक परंपराओं की ओर संकेत करते हैं।

एएसआई द्वारा अदालत में पेश की गई 2189 पन्नों की रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौजूदा ढांचे के नीचे 10वीं-11वीं शताब्दी के परमारकालीन निर्माण के अवशेष मिले हैं। खुदाई के दौरान बड़े बेसाल्ट पत्थर, प्राचीन ईंटें और मंदिर शैली की नींव सामने आईं।

Bhojshala Case पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान संरचना बाद के समय में विकसित की गई प्रतीत होती है। जांच के दौरान कई संस्कृत शिलालेख मिले जिनमें इस स्थल का उल्लेख “शारदा सदन” के रूप में किया गया है। शारदा को देवी सरस्वती का स्वरूप माना जाता है। अदालत ने माना कि किसी धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र के लिए इस प्रकार का उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

केंद्र था परिसर

परिसर से प्राप्त “पारिजात मंजरी” नामक साहित्यिक कृति के शिलालेख में उल्लेख है कि इस नाटक का पहला मंचन यहीं स्थित सरस्वती मंदिर में हुआ था। एएसआई ने इसे यह साबित करने वाला सांस्कृतिक प्रमाण बताया कि भोजशाला केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि शिक्षा, साहित्य और कला गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र रही होगी। रिपोर्ट में कहा गया कि परिसर के 106 स्तंभ और 82 पिलास्टर हिंदू मंदिर वास्तुकला की शैली दर्शाते हैं। इन पर देवी-देवताओं की आकृतियां, पारंपरिक डिज़ाइन और धार्मिक प्रतीक उकेरे गए हैं। जांच में यह भी सामने आया कि कई स्तंभों को मूल स्थान से हटाकर बाद में दोबारा उपयोग किया गया।

मूर्तियों और शिलालेखों से छेड़छाड़ के संकेत

एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि कई संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों को जानबूझकर घिसा गया। कई पत्थरों को उल्टी दिशा में लगाया गया ताकि उन पर लिखी सामग्री पढ़ी न जा सके। इसके अलावा देवी-देवताओं की आकृतियों को भी छेनी-हथौड़े से नुकसान पहुंचाने के निशान मिले हैं। जांच में परिसर से 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत शिलालेख मिले, जबकि अरबी और फारसी के लगभग 56 अभिलेख पाए गए। एएसआई के अनुसार प्राचीन भारतीय भाषाओं के शिलालेख मूल संरचना से जुड़े और अधिक पुराने हैं।

देवी-देवताओं की मूर्तियां मिलीं

परिसर में चक्र, त्रिशूल, स्वास्तिक सहित कई प्रतीक मिले जिन्हें कारीगरों के निर्माण चिह्न बताया गया। इसके साथ ही गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह और भैरव समेत कई देवी-देवताओं की मूर्तियां भी बरामद हुईं। रिपोर्ट में इन्हें मंदिर परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाणों में शामिल किया गया है।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह फैसला अलग-थलग नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या मामले में स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप है, जहां ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों को विशेष महत्व दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी स्थल की ऐतिहासिक पहचान तय करने में वैज्ञानिक जांच सबसे अहम आधार होती है।

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