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Bhadohi Carpet Industry: भदोही के कालीन कारोबार की बदली तस्वीर, 4 हजार करोड़ के पार पहुंचा निर्यात; मिल रहा रोजगार

Bhadohi Carpet Industry

Bhadohi Carpet Industry : उत्तर प्रदेश का भदोही अपनी सदियों पुरानी कालीन बुनाई और कारीगरी के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है. एक समय बुनियादी सुविधाओं, महंगी उत्पादन लागत, कमजोर कनेक्टिविटी और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित पहुंच जैसी चुनौतियों का सामना करने वाला यह उद्योग अब एक बार फिर चर्चा में है. प्रदेश सरकार का दावा है कि 2017 के बाद बुनियादी ढांचे, बिजली, कानून व्यवस्था, निर्यात और पारंपरिक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों से पूर्वांचल के कारोबारी माहौल में बदलाव आया है. इसका असर भदोही के कालीन कारोबार पर भी देखने को मिला है.

Bhadohi Carpet Industry

वित्त वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश से 5,667 करोड़ रुपये के कालीन निर्यात में अकेले भदोही की हिस्सेदारी 4,022 करोड़ रुपये बताई गई है. वहीं भदोही, मिर्जापुर और वाराणसी के पूरे कारपेट क्लस्टर को मिलाकर निर्यात का आंकड़ा 4,960 करोड़ रुपये बताया गया है.

Bhadohi Carpet Industry

भदोही का कालीन उद्योग लंबे समय से निर्यात आधारित कारोबार रहा है. पहले खराब कनेक्टिविटी, बिजली की समस्या और उत्पादन लागत बढ़ने जैसी परेशानियां कारोबारियों और कारीगरों के सामने बड़ी चुनौती थीं. विदेशी खरीदारों तक उत्पाद पहुंचाने और उन्हें स्थानीय स्तर पर आधुनिक प्रदर्शनी सुविधा देने की भी कमी महसूस की जाती थी. पिछले कुछ वर्षों में पूर्वांचल में एक्सप्रेसवे और हाईवे नेटवर्क का विस्तार हुआ है. वाराणसी की हवाई कनेक्टिविटी और जलमार्ग जैसी सुविधाओं के विकास से भी क्षेत्र के निर्यात कारोबार के लिए नए विकल्प तैयार हुए हैं. सरकार का कहना है कि बेहतर कनेक्टिविटी से सामान की आवाजाही आसान हुई है और औद्योगिक क्षेत्रों को बड़े बाजारों से जोड़ने में मदद मिली है.

कालीन को मिली खास जगह

उत्तर प्रदेश सरकार की एक जिला, एक उत्पाद यानी ODOP योजना में भदोही के कालीन उद्योग को शामिल किया गया है. इसके तहत स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग, मार्केटिंग, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया. इसका उद्देश्य छोटे कारीगरों और कारोबारियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराना है. प्रदेश सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 में उत्तर प्रदेश का मर्चेंडाइज निर्यात 84,076 करोड़ रुपये था. वित्त वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 1,83,920 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात कही गई है. हालांकि अलग-अलग वर्षों की निर्यात वृद्धि को केवल किसी एक नीति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि वैश्विक मांग, मुद्रा विनिमय दर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की परिस्थितियां भी निर्यात को प्रभावित करती हैं.

भदोही की बड़ी हिस्सेदारी

वित्त वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश से कुल 5,667 करोड़ रुपये के कालीन निर्यात का आंकड़ा बताया गया है. इसमें भदोही से करीब 4,022 करोड़ रुपये का निर्यात होने का दावा है. इस हिसाब से राज्य के कालीन निर्यात में जिले की हिस्सेदारी करीब 71 फीसदी बैठती है. भदोही के साथ मिर्जापुर और वाराणसी को जोड़कर देखें तो इस कारपेट क्लस्टर से करीब 4,960 करोड़ रुपये के निर्यात का आंकड़ा सामने आता है. यह प्रदेश के कुल कालीन निर्यात का लगभग 87.5 फीसदी है. इससे पूर्वांचल में कालीन कारोबार की आर्थिक अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है.

आजीविका से जुड़ा उद्योग

भदोही का कालीन कारोबार बड़ी संख्या में बुनकरों और कारीगरों की आजीविका से जुड़ा हुआ है. सरकार का दावा है कि इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब पांच लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है. इसमें कालीन बुनने वाले कारीगरों के अलावा डिजाइन, कच्चे माल, पैकेजिंग और निर्यात से जुड़े लोग भी शामिल हैं. अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक सीधे पहुंच बनाने के लिए भदोही में कारपेट एक्सपो मार्ट भी तैयार किया गया है. करीब 7.5 एकड़ में बने इस परिसर का उद्घाटन दिसंबर 2020 में किया गया था. इसका उद्देश्य स्थानीय निर्यातकों और विदेशी खरीदारों को एक ही जगह कारोबार का मंच उपलब्ध कराना है.

विदेशी खरीदारों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश

भदोही में आयोजित इंडिया कारपेट एक्सपो भी इस उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कारोबारी मंच बन गया है. मौजूदा आयोजन में बड़ी संख्या में एग्जीबिटर्स और विभिन्न देशों से विदेशी खरीदारों के पहुंचने की जानकारी सामने आई है. ऐसे आयोजनों के जरिए स्थानीय उत्पादकों को सीधे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से जुड़ने का अवसर मिलता है. योगी सरकार भदोही और पूर्वांचल में हुए बदलाव को अपनी औद्योगिक, बुनियादी ढांचा और कानून व्यवस्था से जुड़ी नीतियों का परिणाम बताती है. दूसरी ओर कालीन उद्योग के आगे निर्यात बाजार में उतार-चढ़ाव, कच्चे माल की कीमत, कारीगरों की आय और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां भी बनी हुई हैं. ऐसे में आने वाले वर्षों में निर्यात के साथ बुनकरों की आय और रोजगार की स्थिति इस बदलाव की वास्तविक तस्वीर को और स्पष्ट करेगी.

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