Europe Goldman Sachs Warning : मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। यूरोप में जुलाई के बाद से नेचुरल गैस की कीमतों में करीब 70 प्रतिशत का उछाल आया है। एक तरफ खाड़ी देशों से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई प्रभावित हो रही है, वहीं दूसरी तरफ यूरोप के कई देशों में गैस का भंडार भी उम्मीद के मुताबिक नहीं भर पाया है। ऐसे में आने वाली सर्दियों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
गोल्डमैन सैक्स रिसर्च ने चेताया है कि सप्लाई में जल्द सुधार नहीं हुआ तो गैस की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। इसका असर भारत जैसे बड़े LNG आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।
Europe Goldman Sachs Warning
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक, 21 सितंबर को यूरोप में गैस की कीमत 73 यूरो प्रति मेगावाट घंटा (MWh) तक पहुंच गई थी। इससे पहले गर्मियों के दौरान कीमतें 30 से 60 यूरो के बीच बनी हुई थीं। हालांकि, हाल के दिनों में कीमतों में 10 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट भी दर्ज हुई है, लेकिन बाजार में अनिश्चितता बरकरार है। बैंक ने अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच गैस की औसत कीमत का अनुमान बढ़ाकर 70 यूरो प्रति MWh कर दिया है। पहले इसके 53 यूरो रहने की संभावना जताई गई थी।
गैस संकट की एक बड़ी वजह फारस की खाड़ी से होने वाले निर्यात में गिरावट है। अनुमान के मुताबिक, इस क्षेत्र से LNG का निर्यात फिलहाल युद्ध से पहले के स्तर के मुकाबले महज 15 से 25 प्रतिशत रह गया है।
बढ़ सकती हैं मुश्किलें
अगर होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई सामान्य नहीं होती है तो यूरोपीय देशों को दूसरे खरीदारों के साथ मुकाबला करना पड़ेगा। ऐसे में अधिक कीमत देकर गैस खरीदने की नौबत आ सकती है। यूरोप में नवंबर से घरों और इमारतों को गर्म रखने के लिए गैस की मांग बढ़ने लगती है। दूसरी तरफ नॉर्थवेस्ट यूरोप में गैस स्टोरेज भरने की रफ्तार धीमी है।
गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि सामान्य सर्दियां रहने पर भी मार्च 2027 के अंत तक गैस भंडार केवल 19 प्रतिशत भरा रह सकता है। यदि ठंड उम्मीद से ज्यादा पड़ती है तो सर्दियों की औसत कीमत का अनुमान करीब 75 प्रतिशत बढ़ सकता है। इसके विपरीत मौसम अपेक्षाकृत गर्म रहने पर कीमतों का अनुमान लगभग 30 प्रतिशत घट सकता है।
LNG संकट का असर
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में LNG आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई घटने से भारतीय ऊर्जा कंपनियों को स्पॉट मार्केट में महंगी गैस खरीदनी पड़ रही है। अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो गैस आधारित बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों की लागत प्रभावित हो सकती है। हालांकि, घरेलू उपभोक्ताओं पर इसका कितना असर होगा, यह सरकारी नीतियों और कंपनियों की खरीद व्यवस्था पर निर्भर करेगा। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच किसी नए समझौते से होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते गैस की आवाजाही बढ़ती है तो कीमतों में राहत मिल सकती है। ऐसी स्थिति में सर्दियों के दौरान यूरोप में गैस की कीमत करीब 50 यूरो प्रति MWh तक आ सकती है।
लंबी अवधि में अमेरिका और कतर की नई उत्पादन क्षमता से वैश्विक बाजार में LNG की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है। बैंक ने 2030 से 2035 के बीच यूरोप में गैस की औसत कीमत 19 यूरो प्रति MWh रहने का अनुमान दिया है। हालांकि, यह स्थिति खाड़ी क्षेत्र से सप्लाई सामान्य होने पर निर्भर करेगी।




