DACP Controversy : काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के आयुर्वेद संकाय में डायनेमिक एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (DACP) योजना के क्रियान्वयन को लेकर विवाद और गहरा गया है। राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग (NCISM) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में सुनवाई के लिए बुलाया है। आयोग का कहना है कि योजना से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं के अनुपालन को लेकर कई शिकायतें प्राप्त हुई हैं, जिनकी जांच आवश्यक है।
मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (MARB) के अध्यक्ष डॉ. मुकुल पटेल द्वारा जारी नोटिस में विश्वविद्यालय प्रशासन को 25 जून को दोपहर दो बजे आयोग के मुख्यालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
DACP Controversy
आयोग ने कहा है कि सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय को योजना से जुड़े सभी मूल अभिलेख, दस्तावेज और आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। साथ ही संबंधित दस्तावेजों की स्कैन प्रतियां भी आयोग को उपलब्ध करानी होंगी ताकि पूरे मामले का विस्तृत परीक्षण किया जा सके। आयोग के अनुसार, 10 जून 2026 को भी विश्वविद्यालय को पत्र भेजकर डीएसीपी योजना से संबंधित विज्ञापन तत्काल वापस लेने और एनसीआईएसएम के नियमों का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया था। लेकिन विश्वविद्यालय ने विज्ञापन निरस्त करने के बजाय उसकी आवेदन अवधि बढ़ा दी। आयोग ने इसे अपने निर्देशों की अवहेलना माना है। इसी वजह से अब मामले को सुनवाई के स्तर तक ले जाया गया है और विश्वविद्यालय से स्पष्टीकरण मांगा गया है।
नियुक्तियों पर लग सकती है रोक
एनसीआईएसएम ने स्पष्ट किया है कि डीएसीपी योजना से जुड़े विज्ञापन को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाना चाहिए। आयोग ने चेतावनी दी है कि यदि नियमों के विपरीत किसी प्रकार की नियुक्ति या पदोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है तो संबंधित शिक्षकों, उनके शिक्षक कोड और संस्थान के खिलाफ एनसीआईएसएम अधिनियम-2020 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इससे आयुर्वेद संकाय में चल रही पदोन्नति प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। डायनेमिक एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन योजना चिकित्सा शिक्षकों और चिकित्सकों को एक निश्चित सेवा अवधि पूरी करने के बाद पदोन्नति और उच्च वेतनमान का लाभ देने से जुड़ी व्यवस्था है। हाल ही में इस योजना को बीएचयू के आयुर्वेद संकाय में लागू किया गया था। हालांकि इसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया को लेकर विभिन्न पक्षों की ओर से आपत्तियां और शिकायतें सामने आईं, जिसके बाद मामला आयोग तक पहुंचा।
सुनवाई के बाद स्पष्ट होगी दिशा
आयोग का कहना है कि उसे प्राप्त अभ्यावेदनों और शिकायतों के आधार पर पहले भी विश्वविद्यालय को निर्देश जारी किए गए थे। अब दूसरी बार नोटिस जारी कर विश्वविद्यालय को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। यदि निर्धारित समय पर विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि उपस्थित नहीं होते हैं तो इसे अंतिम अवसर माना जाएगा। ऐसे में 25 जून की सुनवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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