Govt : देश की राजनीति में चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार गठन को लेकर अक्सर विवाद खड़े होते रहे हैं। कई बार यह सवाल उठता है कि राज्यपाल किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें और किस आधार पर फैसला लें। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई अहम फैसले दे चुका है। अदालत ने साफ कहा है कि चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी या बहुमत वाले गठबंधन को सरकार बनाने का मौका देना राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल यह तय नहीं कर सकता कि किसी दल ने समर्थन कैसे जुटाया। अदालत के मुताबिक, अंतिम फैसला सदन में बहुमत परीक्षण से ही होना चाहिए।
Govt गठन पर सुप्रीम कोर्ट
1994 में आए एस.आर. बोम्मई मामले को भारतीय राजनीति और संविधान के इतिहास में बेहद अहम माना जाता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी। अदालत ने कहा था कि चुनी हुई सरकार को हटाना या विधानसभा भंग करना बेहद गंभीर कदम है और इसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार को गिराने की जल्दबाजी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर सकती है। संविधान पीठ ने चेतावनी देते हुए कहा था कि इस तरह की शक्तियों का बार-बार इस्तेमाल भविष्य में गंभीर राजनीतिक संकट पैदा कर सकता है।
बिहार मामले में यूपीए सरकार को मिली थी फटकार
साल 2006 में आए रामेश्वर प्रसाद केस में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधानसभा भंग करने के फैसले पर तत्कालीन यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना की थी। यह मामला उस समय सामने आया था जब चुनाव के बाद किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था और राजनीतिक दल समर्थन जुटाने में लगे थे।
तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने अपनी रिपोर्ट में आशंका जताई थी कि जेडीयू और बीजेपी विधायकों की खरीद-फरोख्त के जरिए बहुमत जुटा सकते हैं। इसी रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू कर विधानसभा भंग कर दी गई थी लेकिन सुप्रीम Court ने इस कार्रवाई को गलत ठहराया और कहा कि केवल आशंकाओं या राजनीतिक अटकलों के आधार पर किसी दल को सरकार बनाने से नहीं रोका जा सकता।
‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के शक से नहीं रोका जा सकता दावा
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा था कि अगर ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका को ही आधार बना लिया जाए, तो चुनाव बाद बनने वाले हर गठबंधन को संदेह की नजर से देखा जाएगा। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर पड़ेगा और बार-बार चुनाव कराने जैसी स्थिति बन सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन बनना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। कौन किसके साथ सरकार बनाएगा, इसका अंतिम फैसला जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और सदन ही तय करेंगे।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैमाना
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि किसी भी सरकार का असली बहुमत विधानसभा के पटल पर ही साबित होना चाहिए। अदालत ने कहा कि राज्यपाल का काम केवल प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है, न कि राजनीतिक अनुमान लगाना। कोर्ट के मुताबिक, अगर किसी दल या गठबंधन के पास बहुमत होने का दावा है तो उसे सदन में मौका मिलना चाहिए। फ्लोर टेस्ट ही लोकतंत्र का सबसे पारदर्शी और संवैधानिक तरीका है, जिससे तय होता है कि सरकार के पास वास्तव में बहुमत है या नहीं।
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