UP Politics : उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं. भाजपा लगातार सरकार के विकास कार्यों और अपने संगठन की मजबूती को चुनावी जमीन पर भुनाने की तैयारी में है, वहीं समाजवादी पार्टी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट कर सत्ता पक्ष को चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रही है. शाहजहांपुर की ददरौल विधानसभा सीट भी इसी राजनीतिक खींचतान का अहम केंद्र बनती जा रही है. यहां भाजपा विकास कार्यों और मजबूत संगठन के आधार पर अपनी पकड़ बनाए रखने का दावा कर रही है, जबकि सपा पुराने चुनावी आंकड़ों और PDA समीकरण के जरिए मुकाबला बदलने की उम्मीद जता रही है.
ददरौल को लेकर भाजपा की सबसे बड़ी ताकत क्षेत्र में हुए विकास कार्यों को बताया जा रहा है. मौजूदा विधायक अरविंद सिंह का दावा है कि 2017 के बाद से उनके पिता मानवेंद्र सिंह और उनके कार्यकाल के दौरान इलाके में बुनियादी ढांचे पर खास काम हुआ है.
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उनके मुताबिक सड़क और कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्टों ने ददरौल की तस्वीर बदलने में भूमिका निभाई है. क्षेत्र में गंगा एक्सप्रेसवे का गुजरना, बरेली मोड़ से जलालाबाद तक चार लेन सड़क और चौहनापुर से कुरिया कला-मंदनापुर तक सड़क निर्माण को भाजपा अपने विकास मॉडल की उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है. पार्टी का तर्क है कि बेहतर सड़क नेटवर्क से न सिर्फ आवागमन आसान हुआ है, बल्कि व्यापार और औद्योगिक गतिविधियों के लिए भी संभावनाएं बढ़ी हैं.
2024 के उपचुनाव में भाजपा की जीत को भी पार्टी अपने पक्ष में बड़ा संकेत मानती है. विधायक अरविंद सिंह के मुताबिक, उनके पिता मानवेंद्र सिंह की क्षेत्र में बनाई गई राजनीतिक पकड़ और जनसेवा की छवि का फायदा पार्टी को मिला. उनका दावा है कि जनता ने विकास के मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में दोबारा भरोसा जताया.
सपा ने प्रशासन पर लगाए सवाल
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ददरौल में अपनी स्थिति को पहले से मजबूत मान रही है. सपा जिलाध्यक्ष तनवीर खान का दावा है कि पार्टी का जनाधार बढ़ा है. पार्टी का आरोप है कि 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के उपचुनाव में प्रशासनिक दबाव के कारण उसके उम्मीदवारों को नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि, इन आरोपों को लेकर कोई स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं है. सपा की रणनीति ददरौल में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साथ लाने पर टिकी है. पार्टी का मानना है कि अगर PDA वोट एकजुट हुआ तो भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकती है. 2022 में सपा उम्मीदवार राजेश वर्मा करीब 9 हजार वोटों के अंतर से चुनाव हारे थे. अब राजेश वर्मा के भाजपा में जाने के बावजूद सपा अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में है.
जातीय समीकरण में कांटे की टक्कर
ददरौल में करीब सवा तीन लाख से ज्यादा मतदाताओं का सामाजिक समीकरण चुनावी नतीजे पर बड़ा असर डाल सकता है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दलित मतदाता करीब 58 हजार, अन्य ओबीसी 57 हजार, क्षत्रिय 55 हजार और लोधी मतदाता करीब 53 हजार हैं. मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 32 हजार बताई जाती है. यादव करीब 3 हजार और वैश्य मतदाता लगभग 10 हजार हैं. भाजपा के लिए लोधी और क्षत्रिय मतदाताओं की पकड़ अहम है, जबकि सपा दलित, ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं के बीच गठजोड़ बनाने की कोशिश कर सकती है.
बढ़ी दावेदारों की हलचल
भाजपा में मौजूदा विधायक अरविंद सिंह की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है. हालांकि सहकारिता मंत्री जेपीएस राठौर के नाम की भी चर्चा है. भाजपा में शामिल हुए राजेश वर्मा भी संभावित दावेदारों में बताए जा रहे हैं. सपा में पूर्व मंत्री अवधेश वर्मा के अलावा लखन प्रताप सिंह, नीरज मिश्रा और पूर्व मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा के बेटे राजेश वर्मा के नाम चर्चा में हैं. कांग्रेस से तनवीर सफदर दावेदारी कर रहे हैं. स्थानीय राजनीतिक आकलनों के मुताबिक फिलहाल ददरौल में भाजपा की स्थिति मजबूत दिखाई देती है. विधायक की क्षेत्र में सक्रियता, लोगों से संपर्क और विकास कार्य पार्टी के पक्ष में बताए जा रहे हैं.
दूसरी ओर सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक मजबूत और सर्वमान्य उम्मीदवार तय करने की है. हालांकि चुनाव अभी दूर है, इसलिए आने वाले महीनों में टिकट, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे ददरौल का पूरा राजनीतिक गणित बदल सकते हैं.
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