UP Politics : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच महराजगंज जिले की सिसवा सीट पर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं. नेपाल और बिहार की सीमा के करीब स्थित यह विधानसभा क्षेत्र अपने पुराने व्यापारिक महत्व के साथ दिलचस्प चुनावी इतिहास के लिए जाना जाता है. यहां मतदाताओं ने समय-समय पर कांग्रेस, जनता दल, बसपा, सपा और बीजेपी के उम्मीदवारों को मौका दिया है. हालांकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की है. मौजूदा विधायक प्रेमसागर पटेल 2017 और 2022 में लगातार जीत दर्ज कर चुके हैं. ऐसे में 2027 में बीजेपी लगातार तीसरी जीत की कोशिश करेगी, जबकि समाजवादी पार्टी इस सीट पर वापसी की तैयारी में है.
सिसवा में बीजेपी को पहली बार 1993 के विधानसभा चुनाव में सफलता मिली थी. शारदा प्रसाद जायसवाल ने पार्टी को यह जीत दिलाई. इसके बाद भी सीट पर दल और चेहरे बदलते रहे. 1996 में शिवेंद्र सिंह बसपा के टिकट पर विधायक बने. वर्ष 2002 में उन्होंने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की.
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वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अवनींद्र नाथ द्विवेदी उर्फ महंत दुबे के साथ जीत दर्ज की. उन्हें 51,206 वोट मिले, जबकि सपा के शिवेंद्र सिंह 43,835 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे. दोनों के बीच 7,371 वोट का अंतर रहा. सिसवा की राजनीति में शिवेंद्र सिंह का नाम लंबे समय तक प्रभावी रहा है. अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ चुके शिवेंद्र सिंह ने 2012 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की. उन्होंने बीजेपी के डॉ. रमापति राम त्रिपाठी को 16,842 वोटों से हराया था. 2017 के विधानसभा चुनाव में सिसवा का राजनीतिक समीकरण एक बार फिर बदल गया. बीजेपी ने प्रेमसागर पटेल को मैदान में उतारा और उन्होंने बड़ी जीत हासिल की. प्रेमसागर पटेल को 1,22,884 वोट मिले, जबकि सपा के शिवेंद्र सिंह को 54,698 वोट मिले. जीत का अंतर 68,186 वोट रहा.
बीजेपी का दबदबा
2022 में बीजेपी ने एक बार फिर प्रेमसागर पटेल पर भरोसा जताया. इस बार उनके सामने समाजवादी पार्टी के सुशील कुमार तिबड़ेवाल थे. प्रेमसागर पटेल को 1,27,673 वोट मिले, जबकि सपा प्रत्याशी को 64,942 वोट मिले. बीजेपी ने यह चुनाव 62,731 वोट के अंतर से जीता. बसपा के धीरेंद्र प्रताप सिंह 33,498 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे.
2027 की तैयारियों के बीच बीजेपी स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को प्रमुखता से सामने रख रही है. विधायक प्रेमसागर पटेल के समर्थक राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज, आवासीय विद्यालय, बिजली से जुड़े काम और सिसवा को नगर पालिका का दर्जा मिलने जैसे फैसलों को उपलब्धि के रूप में गिना रहे हैं. परिवहन सुविधाओं के विस्तार और निचलौल क्षेत्र में प्रस्तावित परियोजनाओं का भी जिक्र किया जा रहा है.
सपा उठा रही महंगाई
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी स्थानीय और प्रदेश स्तर के मुद्दों को लेकर बीजेपी सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है. महंगाई, खाद की उपलब्धता, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवाद विपक्ष के प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं. सपा नेताओं ने 2022 के चुनाव से जुड़े कुछ आरोप भी लगाए हैं, जिन्हें बीजेपी की ओर से स्वीकार नहीं किया गया है. सिसवा विधानसभा क्षेत्र में अलग-अलग पिछड़े, दलित, सवर्ण और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाता मौजूद हैं. यहां चुनावी गणित केवल किसी एक जातीय समूह पर निर्भर नहीं रहता.
उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, पार्टी का संगठन और ग्रामीण व शहरी मतदाताओं के मुद्दे भी नतीजों को प्रभावित करते रहे हैं. आधिकारिक जातिवार मतदाता आंकड़े उपलब्ध नहीं होने के कारण किसी समुदाय की निश्चित संख्या के आधार पर चुनावी निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा.
बदल सकता है मुकाबला
पिछले दो चुनावों के नतीजे बीजेपी के पक्ष में रहे हैं, लेकिन इन्हें 2027 के परिणाम की गारंटी नहीं माना जा सकता. सपा अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश में है, जबकि बीजेपी मौजूदा विधायक और सरकार के कामकाज को आगे रख रही है. दोनों दल किसे उम्मीदवार बनाते हैं और चुनाव तक स्थानीय मुद्दे क्या रूप लेते हैं, इससे मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है. 2017 में 68 हजार से अधिक और 2022 में 62 हजार से अधिक वोटों से बीजेपी की जीत सिसवा में पार्टी की पिछले दो चुनावों की मजबूत स्थिति दिखाती है.
वहीं, सीट का पुराना इतिहास बताता है कि यहां मतदाताओं ने अलग-अलग समय पर पार्टियां भी बदली हैं. ऐसे में 2027 में बीजेपी लगातार तीसरी जीत दर्ज करेगी या सपा वापसी करेगी, इसका फैसला आखिरकार सिसवा के मतदाता ही करेंगे.
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