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TMC Crisis: तृणमूल कांग्रेस में बढ़ी बगावत की आहट, विधायकों की बैठक से तेज हुई सियासी हलचल

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TMC Crisis : पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में इन दिनों अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आती दिख रही है। पार्टी से बाहर किए गए दो विधायकों की एक बैठक ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के भीतर एक ऐसा वर्ग मौजूद है जो मौजूदा नेतृत्व के कुछ फैसलों से असहज महसूस कर रहा है। हालांकि पार्टी की ओर से इस तरह की अटकलों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन हाल की घटनाओं ने विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर खींचा है। सोमवार देर शाम विधायक हॉस्टल में हुई एक बैठक ने पूरे मामले को और गर्म कर दिया।

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इस बैठक में पार्टी से निकाले गए विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी मौजूद रहे। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, कुछ अन्य विधायक भी उनसे मिले। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि पार्टी के भीतर असंतोष का दायरा पहले से बड़ा हो सकता है। हालांकि बैठक में शामिल नेताओं ने किसी बड़े राजनीतिक कदम की औपचारिक घोषणा नहीं की।

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पूरा विवाद उस समय सामने आया जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से जुड़े प्रस्ताव को लेकर सवाल उठाए गए। संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने आरोप लगाया था कि जिस दस्तावेज पर उनका समर्थन दिखाया गया, उसमें उनके हस्ताक्षर वास्तविक नहीं थे। इस मुद्दे को लेकर दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई थी। इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए दोनों को संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

संदीपन बोले- सवाल उठाना ही अपराध बन गया

पार्टी से निष्कासन के बाद संदीपन साहा ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि संगठन के भीतर नैतिकता और पारदर्शिता की बात करना ही अब विरोधी गतिविधि माना जाने लगा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल होने का उनका कोई इरादा नहीं है। उनके इस बयान ने यह संकेत दिया कि असहमति रखने वाले नेता अभी भी अपनी राजनीतिक लड़ाई को अलग तरीके से आगे बढ़ाना चाहते हैं।

कांग्रेस ने साधा ममता सरकार पर निशाना

तृणमूल कांग्रेस में चल रही हलचल पर विपक्षी दलों ने भी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है। कांग्रेस नेता उदित राज ने कहा कि पार्टी के भीतर बढ़ रहा असंतोष लंबे समय से पनप रहा था और अब वह खुलकर सामने आने लगा है। उन्होंने दावा किया कि कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच नाराजगी बढ़ रही है, जिसका असर आने वाले समय में दिखाई दे सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में विधायक एक साथ अलग रुख अपनाते हैं, तो दो संभावनाएं बन सकती हैं। पहली यह कि दो-तिहाई विधायक किसी अन्य दल का दामन थाम लें, जिससे उन्हें दलबदल कानून के तहत राहत मिल सकती है। दूसरी संभावना यह है कि असंतुष्ट विधायक खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताकर अलग गुट के रूप में दावा पेश करें। ऐसी स्थिति में मामला चुनाव आयोग तक पहुंच सकता है।

संविधान और दलबदल कानून

भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर एंटी-डिफेक्शन कानून कहा जाता है, ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 91वें संविधान संशोधन के बाद यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक सामूहिक रूप से अलग होने का फैसला करते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है। इसके बाद चुनाव आयोग यह तय करता है कि पार्टी पर वास्तविक अधिकार किस गुट का है। इस प्रक्रिया में संगठनात्मक समर्थन, कार्यकारिणी की स्थिति, पार्टी संविधान और निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन जैसे पहलुओं का आकलन किया जाता है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर उठी यह हलचल किस दिशा में जाएगी, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि हाल की घटनाओं ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को नई चर्चा दे दी है। यदि असंतोष और बढ़ता है तो इसका असर केवल पार्टी संगठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य की राजनीतिक तस्वीर पर भी पड़ सकता है।

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