India Purest Vegetarian State : मानव सभ्यता की कहानी खान-पान के साथ ही आगे बढ़ी है। आदिम समाज में शिकार से शुरू हुआ भोजन का सफर खेती, पशुपालन और रसोई तक पहुंचा। समय के साथ भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं रहा, बल्कि संस्कृति, धर्म और जीवनशैली की पहचान बन गया। कहीं मसालों की खुशबू ने इतिहास रचा, तो कहीं सादगी ने परंपरा को संभाले रखा। दुनिया के हर हिस्से में खान-पान स्थानीय जलवायु, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक सोच से जुड़ा रहा है। भारत में यह रिश्ता और भी गहरा दिखता है, जहां भोजन पूजा, व्रत और त्योहारों का हिस्सा है।
यहां शाकाहार केवल ऑप्शन नहीं होता, बल्कि आस्था और जीवन दर्शन का रूप भी रहा है। इसी परंपरा के बीच भारत में एक ऐसा इलाका भी है, जहां शुद्ध शाकाहार सिर्फ पसंद नहीं, बल्कि पहचान बन चुका है।
India का सबसे शुद्ध शाकाहारी राज्य
आज के दौर में खाने के शौकीन दुनिया के कोने-कोने में नई डिशेज़ की तलाश में निकल पड़ते हैं। यूरोप, एशिया, अफ्रीका हर जगह मांसाहार और शाकाहार का अलग-अलग संतुलन देखने को मिलता है। कई देशों में नॉनवेज भोजन आम है, तो कुछ जगहों पर शाकाहारी विकल्प ढूंढना चुनौती बन जाता है। फिर भी वैश्विक स्तर पर मांसाहार लगभग हर समाज का हिस्सा रहा है। भारत की बात करें तो यहां खान-पान केवल स्वाद नहीं, संस्कार से जुड़ा विषय है। बड़ी आबादी आज भी दाल-रोटी, सब्जी और दूध से बने व्यंजनों को प्राथमिकता देती है। धार्मिक मान्यताओं, आयुर्वेद और पारंपरिक सोच ने शाकाहार को मजबूत आधार दिया है। यही वजह है कि भारत दुनिया के उन देशों में गिना जाता है, जहां शाकाहारी लोगों की संख्या सबसे अधिक है।
क्या कहती है सर्वे?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़ी संख्या में लोग सप्ताह में कम से कम एक बार मांसाहार लेते हैं। शहरी क्षेत्रों में यह चलन ग्रामीण इलाकों से अधिक है। इसके बावजूद भारत में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो अंडा तक नहीं खाता और पूरी तरह शाकाहारी जीवनशैली अपनाए हुए है। इन आंकड़ों के बीच एक राज्य ऐसा भी सामने आता है, जहां शाकाहार बहुसंख्यक लोगों की दिनचर्या है। यहां मांस, मछली तो दूर, अंडे को भी भोजन का हिस्सा नहीं माना जाता। यह राज्य राजस्थान है।
जी हां! नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, यहां शाकाहारी आबादी का अनुपात देश में सबसे अधिक है। राजस्थान के खान-पान में मरुस्थलीय जीवन की छाप साफ दिखती है। कम पानी और कठोर परिस्थितियों में पनपी रसोई ने दाल-बाटी-चूरमा, गट्टे की सब्जी, केर-सांगरी जैसे व्यंजन दिए। दूध, घी और अनाज यहां की थाली का आधार हैं। शाकाहार यहां केवल मजबूरी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है।
राजस्थान में शाकाहार के पीछे धार्मिक आस्थाओं की बड़ी भूमिका रही है। जैन, वैष्णव और अन्य समुदायों में अहिंसा का सिद्धांत भोजन की आदतों को दिशा देता है। यही वजह है कि कई शहरों और कस्बों में शुद्ध शाकाहारी भोजनालय आम हैं और मांसाहार सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता।
नागालैंड से तुलना
जहां राजस्थान शाकाहार की मिसाल है, वहीं नागालैंड ऐसा राज्य है, जहां शाकाहारी लोगों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम बताई जाती है। वहां मांसाहार स्थानीय संस्कृति और खान-पान का अभिन्न हिस्सा है। यह अंतर दिखाता है कि भारत में भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान भी है। राजस्थान आने वाले सैलानियों को भी यहां शुद्ध शाकाहारी भोजन का अनुभव मिलता है। कई यात्रियों के लिए यह नई बात होती है कि पूरे शहर में मांसाहार न के बराबर है। यही विशिष्टता राजस्थान को खान-पान के नक्शे पर अलग पहचान दिलाती है।
भारत की खूबसूरती इसी विविधता में है। कहीं शाकाहार जीवन दर्शन है, तो कहीं मांसाहार परंपरा। राजस्थान इस बात का उदाहरण है कि कैसे भोजन किसी राज्य की सांस्कृतिक आत्मा बन सकता है।
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