IIT BHU : आईआईटी (बीएचयू) के जैव-रासायनिक अभियंत्रिकी विभाग ने घरेलू कचरे के निस्तारण के लिए एक नई तकनीक विकसित की है, जो रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे को मात्र 30 दिनों में खाद में बदल देती है। इस नवाचार को बायो-कन्वर्टर डस्टबिन नाम दिया गया है, जिसे शहरी कचरा प्रबंधन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। विभाग के वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक सुरेश ढोबले के अनुसार, अब तक घरों से निकलने वाले किचन वेस्ट को खाद बनने में सामान्यतः 90 दिन तक का समय लगता था।
इस नई तकनीक में नियंत्रित ऑक्सीजन सप्लाई और विशेष जैव-रासायनिक प्रक्रिया के जरिए यह समय घटाकर लगभग एक-तिहाई कर दिया गया है। शुरुआती चरण में इस तकनीक का परीक्षण प्लास्टिक कंटेनरों में किया गया था, लेकिन बाद में गुणवत्ता सुधार के लिए स्टील और मिट्टी के पात्रों का उपयोग किया गया।
IIT BHU: प्रक्रिया तेज
प्रयोगों के दौरान पाया गया कि सही वेंटिलेशन और सूक्ष्म छिद्रों वाली संरचना अपघटन प्रक्रिया को काफी तेज कर देती है। इसी आधार पर डस्टबिन में एक विशेष एयर पाइप और छोटे-छोटे छिद्रों की व्यवस्था की गई है, जिससे ऑक्सीजन का प्रवाह लगातार बना रहता है। इस प्रणाली में सामान्य एयर पंप या एक्वेरियम में इस्तेमाल होने वाले ऑक्सीजन पंप के जरिए हवा दी जाती है। इससे कचरे में तेजी से सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं और जैविक अपघटन की प्रक्रिया तेज हो जाती है। साथ ही, दुर्गंध को नियंत्रित करने के लिए विशेष जैव-रासायनिक तत्वों का भी उपयोग किया गया है, जिससे आसपास का वातावरण प्रभावित नहीं होता।
मिल चुका पेटेंट
डॉ. ढोबले ने बताया कि इस तकनीक को हाल ही में पेटेंट मिल चुका है और अब इसे व्यावसायिक रूप से लॉन्च करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए निवेशकों से बातचीत की जा रही है, जबकि शुरुआती स्तर पर इसका प्रचार-प्रसार आईआईटी बीएचयू के स्टार्टअप सेल के माध्यम से किया जाएगा। आने वाले समय में इसे नगर निगम और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के साथ जोड़ने की योजना है, ताकि यह तकनीक बड़े पैमाने पर घरों तक पहुंच सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के बायो-कन्वर्टर डस्टबिन का व्यापक उपयोग शुरू होता है, तो शहरी क्षेत्रों में कचरे के बढ़ते ढेर को काफी हद तक कम किया जा सकता है और स्वच्छता प्रबंधन को नई दिशा मिल सकती है।
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