Civil Lines : देश के कई शहरों में मौजूद ‘सिविल लाइंस’ इलाके अब बदलाव की ओर बढ़ सकते हैं। केंद्र सरकार औपनिवेशिक दौर की पहचान को कम करने और भारतीय संस्कृति से जुड़े नामों को बढ़ावा देने पर काम कर रही है। इसी कड़ी में सिविल लाइंस जैसे इलाकों के नाम बदलने या उनके स्वरूप को भारतीय परंपरा के अनुसार ढालने की चर्चा तेज हो गई है। सिविल लाइंस आमतौर पर शहर का वह हिस्सा होता है, जो बाकी इलाकों से ज्यादा विकसित और व्यवस्थित नजर आता है।
यहां चौड़ी सड़कें, पुराने बड़े बंगले और बेहतर सुविधाएं देखने को मिलती हैं। Civil Lines नाम का इस्तेमाल आज भी Delhi, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh और कई अन्य राज्यों के शहरों में होता है।
Civil Lines
सिविल लाइंस का कॉन्सेप्ट 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ था। इन इलाकों को खास तौर पर अंग्रेज अफसरों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के रहने के लिए बसाया गया था। शहर की प्लानिंग में एक तरफ सैन्य क्षेत्र यानी कैंटोनमेंट होता था और दूसरी ओर सिविल लाइंस विकसित किया जाता था, जो सत्ता के करीब रहने वाले अधिकारियों का केंद्र होता था। हाल ही में Narendra Modi ने अधिकारियों को औपनिवेशिक दौर के बचे हुए प्रतीकों की पहचान करने और उनके भारतीय विकल्प तलाशने को कहा था। सरकार का मकसद देश को मानसिक और सांस्कृतिक रूप से औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करना है। इसी दिशा में सिविल लाइंस जैसे नामों पर भी विचार किया जा रहा है।
पहले भी बदले गए हैं नाम
पिछले कुछ सालों में कई सड़कों और जगहों के नाम बदले जा चुके हैं। उदाहरण के तौर पर Race Course Road का नाम बदलकर Lok Kalyan Marg किया गया। इसी तरह कई अन्य जगहों के नाम भी भारतीय पहचान के अनुरूप किए गए हैं। हालांकि, कुछ शहरी योजनाकार इस बदलाव को ज्यादा जरूरी नहीं मानते। उनका कहना है कि समय के साथ सिविल लाइंस का स्वरूप पहले ही काफी बदल चुका है। पुराने बंगलों की जगह अब बहुमंजिला इमारतें बन गई हैं और ये इलाके शहर के मुख्य हिस्सों में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में सिर्फ नाम बदलने से बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा।
देशभर में फैला है सिविल लाइंस नेटवर्क
सिविल लाइंस सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अवधारणा देश के कई राज्यों में फैली हुई है। Rajasthan, Punjab, Haryana, Bihar और Maharashtra जैसे राज्यों में भी इस नाम के इलाके मौजूद हैं, जो अब आधुनिक शहरों का हिस्सा बन चुके हैं। फिलहाल, सरकार की ओर से कोई अंतिम फैसला नहीं आया है, लेकिन जिस तरह औपनिवेशिक प्रतीकों को बदलने की प्रक्रिया चल रही है, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में ‘सिविल लाइंस’ नाम में बदलाव देखने को मिल सकता है। अब देखना होगा कि यह सिर्फ नाम बदलने तक सीमित रहता है या इन इलाकों के स्वरूप में भी बड़ा परिवर्तन किया जाता है।
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