Rafale Deal : भारतीय वायुसेना के लिए 114 लड़ाकू विमानों की संभावित खरीद को लेकर भारत और फ्रांस के बीच चल रही बातचीत में एक तकनीकी मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण बन गया है। यह मुद्दा ‘इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट’ यानी ICD से जुड़ा है। फ्रांस अब भारत के साथ इससे जुड़ी जरूरी तकनीकी जानकारी साझा करने के विकल्प पर विचार कर रहा है। अगर दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर सहमति बनती है तो राफेल को लेकर आगे की बातचीत में एक बड़ी बाधा दूर हो सकती है। भारत की जरूरत केवल नए लड़ाकू विमान खरीदने तक सीमित नहीं है।
वह चाहता है कि भविष्य में राफेल में भारतीय हथियारों को अपनी जरूरत के अनुसार इंटीग्रेट करने की क्षमता भी उसके पास हो। इसी कारण ICD महत्वपूर्ण हो जाता है। इसे आसान भाषा में किसी सिस्टम को दूसरे सिस्टम से जोड़ने वाला तकनीकी मैनुअल समझा जा सकता है।
Rafale Deal
उदाहरण के लिए राफेल को एक स्मार्टफोन और उसमें लगाई जाने वाली मिसाइल को किसी दूसरे स्मार्ट डिवाइस की तरह समझें। दोनों के पास अपनी तकनीक होने के बावजूद आपस में काम करने के लिए एक तय कम्युनिकेशन सिस्टम की जरूरत होगी। ICD में इसी इंटरफेस से जुड़ी तकनीकी जानकारी होती है, जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि बाहरी हथियार या सिस्टम विमान के मिशन कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के साथ किस तरह संवाद करेगा। फाइटर जेट से मिसाइल दागना केवल उसे विमान के नीचे फिट करने तक सीमित नहीं होता। विमान के मिशन कंप्यूटर को मिसाइल के साथ डेटा साझा करना पड़ता है।
टारगेट की जानकारी, फायरिंग कमांड और दूसरे जरूरी संकेत दोनों सिस्टम के बीच सही तरीके से पहुंचने चाहिए। ICD इस इंटीग्रेशन के लिए आवश्यक इंटरफेस, सिग्नल, डेटा और तकनीकी जरूरतों की जानकारी उपलब्ध करा सकता है।
जरूरी इंटरफेस
यहीं ICD और सोर्स कोड के बीच बड़ा अंतर समझना जरूरी है। सोर्स कोड किसी विमान के मुख्य सॉफ्टवेयर सिस्टम के अंदरूनी कामकाज से जुड़ा होता है और बेहद संवेदनशील तकनीकी जानकारी मानी जाती है। विमान बनाने वाली कंपनियां और देश आमतौर पर इसे साझा करने से बचते हैं। भारत की जरूरत पूरे राफेल का सोर्स कोड हासिल करने के बजाय अपने हथियारों के इंटीग्रेशन के लिए जरूरी इंटरफेस जानकारी तक पहुंच से जुड़ी बताई जा रही है। अगर भारत को पर्याप्त ICD एक्सेस मिलता है तो इसका सबसे बड़ा फायदा स्वदेशी हथियारों के इंटीग्रेशन में हो सकता है। DRDO की अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल और रुद्रम सीरीज जैसे भारतीय हथियारों को भविष्य में राफेल के साथ जोड़ने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
इसी तरह ब्रह्मोस-NG तैयार होने के बाद उसके इंटीग्रेशन की संभावना पर भी काम किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी हथियार को वास्तव में राफेल पर लगाने के लिए अलग तकनीकी परीक्षण, सॉफ्टवेयर बदलाव, उड़ान परीक्षण और प्रमाणन की जरूरत होगी।
आर्थिक फायदा भी महत्वपूर्ण
इस व्यवस्था का आर्थिक फायदा भी महत्वपूर्ण हो सकता है। अभी किसी नए हथियार को विदेशी लड़ाकू विमान के साथ जोड़ने के लिए मूल निर्माता की तकनीकी मदद की जरूरत पड़ सकती है। इससे लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं। जरूरी इंटरफेस जानकारी और अधिकार मिलने पर भारत भविष्य में कुछ इंटीग्रेशन का काम घरेलू स्तर पर कर सकेगा और हर बदलाव के लिए विदेशी कंपनी पर निर्भरता कम हो सकती है। इसका रणनीतिक महत्व युद्ध जैसी परिस्थितियों में और बढ़ जाता है। भारतीय वायुसेना अगर विदेशी प्लेटफॉर्म के साथ अपनी पसंद के स्वदेशी हथियार इस्तेमाल करने की अधिक स्वतंत्रता हासिल करती है तो ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ सकती है। साथ ही भविष्य में विकसित होने वाले नए भारतीय हथियारों को भी राफेल के साथ जोड़ने के विकल्प खुले रहेंगे।
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि वह केवल तैयार विदेशी हथियार खरीदने के बजाय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। ऐसे में नया फाइटर प्लेटफॉर्म ऐसा होना चाहिए जिसे आने वाले वर्षों में भारतीय सेंसर, हथियार और दूसरे सिस्टम के हिसाब से अपग्रेड किया जा सके।
मिल जाएगा सोर्स कोड
हालांकि, ICD साझा होने का मतलब यह नहीं होगा कि भारत को राफेल की पूरी तकनीक या उसका सोर्स कोड मिल जाएगा। यह मुख्य रूप से तय सिस्टम और हथियारों के बीच इंटीग्रेशन के लिए जरूरी तकनीकी जानकारी तक पहुंच का मामला है। इसके दायरे और अधिकारों पर अंतिम सहमति दोनों पक्षों के बीच होने वाले समझौते पर निर्भर करेगी। 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की संभावित खरीद भारतीय वायुसेना के लिए एक बड़ा रक्षा कार्यक्रम है। अगर राफेल को लेकर बातचीत आगे बढ़ती है तो कीमत, भारत में निर्माण, तकनीक हस्तांतरण, स्वदेशी हथियारों के इंटीग्रेशन और भविष्य के रखरखाव जैसे कई मुद्दे अंतिम समझौते का हिस्सा होंगे।
इनमें ICD से जुड़ी शर्त भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस पर सहमति बनने से राफेल को भारतीय जरूरतों के मुताबिक ढालने और भविष्य में विदेशी तकनीकी निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ी बढ़त मिल सकती है।





