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Mars Bio House: न सीमेंट, न भारी मशीनों का बोझ; मंगल की रेत से घर बनाने का वैज्ञानिकों ने खोजा तरीका

Mars Bio House

Mars Bio House : मंगल ग्रह पर इंसानों को बसाने की योजना में सबसे बड़ी परेशानियों में से एक वहां सुरक्षित घर तैयार करना है। पृथ्वी से सीमेंट, स्टील और भारी निर्माण मशीनें मंगल तक पहुंचाना बेहद महंगा और मुश्किल होगा। इसी चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया तरीका खोजा है। इंजीनियर किए गए यीस्ट, जिलेटिन और मंगल की स्थानीय रेत जैसे मटीरियल को मिलाकर ऐसा निर्माण पदार्थ तैयार किया गया है, जिससे भविष्य में 3D प्रिंटिंग के जरिए मजबूत शेल्टर बनाए जा सकते हैं। हांगकांग के वैज्ञानिकों की टीम ने इस तकनीक पर काम किया है।

Mars Bio House

रिसर्च में एक खास बायोलॉजिकल बाइंडर विकसित किया गया, जो रेत जैसे दानेदार पदार्थों को मजबूती से आपस में जोड़ सकता है। इसका फायदा यह है कि मंगल पर उपलब्ध रेगोलिथ को निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा और ज्यादातर भारी कच्चा माल पृथ्वी से ले जाने की जरूरत कम हो सकती है।

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पारंपरिक तरीके से मंगल की मिट्टी या चट्टानों को निर्माण योग्य पदार्थ में बदलने के लिए बहुत ज्यादा तापमान और ऊर्जा की आवश्यकता पड़ सकती है। कुछ तकनीकों में मटीरियल को करीब 1000 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करना पड़ता है। इसके उलट नई बायोलॉजिकल तकनीक अपेक्षाकृत कम ऊर्जा में काम कर सकती है। वैज्ञानिकों ने इंजीनियर यीस्ट और जिलेटिन के साथ मसेल यानी एक प्रकार के समुद्री जीव से प्रेरित चिपकने वाले प्रोटीन का इस्तेमाल किया है। यह रेत के कणों को आपस में बांधकर मजबूत संरचना तैयार करने में मदद करता है।

इस नए मटीरियल की मजबूती भी वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण रही। परीक्षण में इसकी कंप्रेसिव स्ट्रेंथ करीब 12 मेगापास्कल (MPa) दर्ज की गई। शोध के अनुसार, यह सामान्य मिश्रण के मुकाबले लगभग 170 प्रतिशत ज्यादा मजबूत हो सकता है। मंगल जैसी परिस्थितियों में मटीरियल के सूखने के बाद एक मजबूत और छिद्रपूर्ण संरचना तैयार होती है।

दबाव वाला वातावरण तैयार

वैज्ञानिकों ने केवल मटीरियल तैयार करने तक प्रयोग सीमित नहीं रखा। लैब में मंगल ग्रह से मिलती-जुलती परिस्थितियां बनाकर इसकी क्षमता को भी परखा गया। इसके लिए लगभग माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तापमान और पृथ्वी के मुकाबले बेहद कम वायुमंडलीय दबाव वाला वातावरण तैयार किया गया। इसके बाद 3D प्रिंटर की मदद से इस पदार्थ से एक छोटा ढांचा सफलतापूर्वक बनाया गया। नई तकनीक का एक बड़ा फायदा इसकी कम ऊर्जा जरूरत बताई जा रही है। मंगल के रेगोलिथ को पिघलाकर ईंट या अन्य निर्माण सामग्री तैयार करने वाले तरीकों में काफी समय और ऊर्जा खर्च हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, प्रस्तावित बायोलॉजिकल प्रक्रिया में एक क्यूबिक मीटर निर्माण सामग्री तैयार करने के लिए लगभग एक घंटे की सौर ऊर्जा क्षमता पर्याप्त हो सकती है।

नया आकार दिया जा सकता

इस मटीरियल को दोबारा इस्तेमाल करने की संभावना भी इसकी खासियत है। इसे तोड़ने और गर्म करने के बाद फिर से नया आकार दिया जा सकता है। परीक्षण में कई बार रीसाइक्लिंग के बाद भी इसकी मजबूती में बहुत ज्यादा कमी नहीं देखी गई। चौथे रीसाइक्लिंग चक्र के बाद भी इसकी कंप्रेसिव स्ट्रेंथ करीब 11.8 MPa दर्ज की गई। इस तकनीक का एक और फायदा मंगल तक पहुंचाए जाने वाले सामान के वजन में कमी हो सकती है। भविष्य में एक क्यूबिक मीटर निर्माण सामग्री तैयार करने के लिए पृथ्वी से केवल कुछ किलोग्राम यीस्ट और जिलेटिन जैसे जरूरी पदार्थ ले जाने पड़ सकते हैं, जबकि मुख्य दानेदार सामग्री मंगल पर मौजूद रेगोलिथ से मिल सकती है।

पृथ्वी पर निर्भरता कम

वैज्ञानिक इससे भी आगे की संभावनाएं देख रहे हैं। यदि भविष्य में मंगल पर उपलब्ध कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और बर्फ जैसे संसाधनों से जरूरी पोषक तत्व या निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ तैयार करने की तकनीक विकसित हो जाती है, तो पृथ्वी पर निर्भरता और कम की जा सकती है। इस तकनीक का इस्तेमाल केवल मंगल ग्रह तक सीमित रहने की जरूरत भी नहीं है। पृथ्वी पर अंटार्कटिका जैसे बेहद ठंडे और दूरदराज इलाकों में रिसर्च स्टेशन या अस्थायी ढांचे तैयार करने में भी इसका उपयोग संभव हो सकता है। हालांकि, इंसानों के रहने लायक वास्तविक मंगल आवास बनाने से पहले इस मटीरियल की लंबे समय तक टिकाऊ क्षमता, रेडिएशन से सुरक्षा और मंगल के वास्तविक वातावरण में प्रदर्शन की व्यापक जांच जरूरी होगी।

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