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UP Politics: जाट-मुस्लिम-दलित समीकरण के बीच BJP-सपा की परीक्षा, बिजनौर में किसके सामने क्या चुनौती?

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UP Politics : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बिजनौर सदर सीट पर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं. पिछले दो बड़े चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि यहां किसी एक दल के लिए मुकाबला आसान नहीं रहा है. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सुचि मौसम चौधरी ने महज 1,445 वोटों से जीत हासिल की थी. इसके दो साल बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी ने एनडीए प्रत्याशी पर 991 वोटों की बढ़त बनाई. खास बात यह है कि 2022 और 2024 के बीच राजनीतिक गठबंधन भी बदल चुका है.

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पिछले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल सपा के साथ था, जबकि अब आरएलडी बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा है. ऐसे में 2027 में जाट, मुस्लिम और दलित मतदाताओं के साथ अन्य पिछड़ी जातियों का रुख और उम्मीदवारों का चयन इस सीट के मुकाबले को प्रभावित कर सकता है.

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2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपनी मौजूदा विधायक सुचि मौसम चौधरी पर दोबारा भरोसा जताया था. उन्हें 97,165 वोट मिले थे. सपा-आरएलडी गठबंधन की तरफ से चुनाव लड़े नीरज चौधरी को 95,720 वोट हासिल हुए थे. दोनों के बीच केवल 1,445 वोट का अंतर रहा था. लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान बिजनौर विधानसभा क्षेत्र में तस्वीर बदल गई. यहां सपा के दीपक सैनी को 89,429 वोट मिले, जबकि आरएलडी के चंदन चौहान को 88,438 वोट मिले. इस तरह इस विधानसभा सेगमेंट में सपा 991 वोट से आगे रही. हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे तथा उम्मीदवार अलग होते हैं, इसलिए इस बढ़त को सीधे 2027 के नतीजे से जोड़कर नहीं देखा जा सकता.

मुस्लिम मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा

स्थानीय राजनीतिक आकलनों में बिजनौर सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब एक लाख बताई जाती है. इसके अलावा लगभग 70 हजार जाट और करीब 50 हजार दलित मतदाता होने का अनुमान लगाया जाता है. ये आंकड़े आधिकारिक जातिवार मतदाता गणना नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्थानीय चुनावी अनुमानों के रूप में ही देखा जाना चाहिए. स्थानीय अनुमानों के मुताबिक, सीट पर करीब 25 हजार सैनी, 22 हजार राजपूत, 12 हजार कश्यप और 10-10 हजार के आसपास ब्राह्मण और पाल मतदाता बताए जाते हैं. नाई, प्रजापति, वैश्य, गुर्जर और पंजाबी समुदाय की भी मौजूदगी है. पिछले चुनाव का बेहद कम अंतर बताता है कि छोटे माने जाने वाले वोट समूह भी मुकाबले में महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

बदला पुराना समीकरण

2022 में जयंत चौधरी की आरएलडी समाजवादी पार्टी के साथ थी. उस चुनाव में सपा-आरएलडी गठबंधन ने बिजनौर में बीजेपी को कड़ी चुनौती दी थी. अब आरएलडी एनडीए में शामिल है. इसलिए 2027 में यह देखना अहम होगा कि गठबंधन में हुए बदलाव का जाट मतदाताओं के रुख पर कितना असर पड़ता है. बिजनौर में दलित मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं. बहुजन समाज पार्टी का इस क्षेत्र में अपना राजनीतिक आधार रहा है. ऐसे में दलित मतों का एकतरफा या अलग-अलग दलों में बंटना बीजेपी और सपा दोनों के चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है. बसपा का उम्मीदवार भी मुकाबले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

गन्ना और किसानों के मुद्दे भी अहम

बिजनौर गन्ना उत्पादक क्षेत्र है. इसलिए गन्ने का मूल्य, भुगतान, किसानों की आय और स्थानीय कृषि समस्याएं चुनावी चर्चा का हिस्सा रह सकती हैं. राजनीतिक दलों की ओर से चुनाव तक किसानों को लेकर लिए जाने वाले फैसलों का असर मतदाताओं के रुख पर कितना पड़ता है, यह भी देखने वाली बात होगी. फिलहाल, बीजेपी, सपा या अन्य प्रमुख दलों ने 2027 के लिए अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं. 2022 में केवल 1,445 वोट का अंतर और 2024 में सपा की 991 वोट की बढ़त यह जरूर दिखाती है कि बिजनौर में हाल के चुनाव करीबी रहे हैं. बदले गठबंधन, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और स्थानीय मुद्दों के आधार पर ही 2027 के मुकाबले की वास्तविक तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होगी.

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