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Yamunotri Highway: बारिश के बाद यमुनोत्री हाईवे पर भूस्खलन, मलबे में फंसे वाहन; 12 गांवों की बिजली गुल

Yamunotri Highway

Yamunotri Highway : यमुनोत्री क्षेत्र उत्तरकाशी में देर रात हुई बारिश के बाद पहाड़ों में भू-धंसाव और भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं। इसके चलते यमुनोत्री हाईवे कई स्थानों पर बाधित हो गया। सड़क पर मलबा और बड़े पत्थर आने से स्थानीय लोगों के साथ यमुनोत्री धाम जाने वाले श्रद्धालुओं के वाहन भी अलग-अलग जगहों पर फंस गए। हाईवे को दोबारा सुचारु करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग की टीम मशीनों के साथ मौके पर जुटी हुई है। NH अधिकारियों के मुताबिक बारिश के बाद पहाड़ी हिस्सों से बड़ी मात्रा में मलबा सड़क पर आ गया। कई स्थानों पर भू-धंसाव होने के कारण रास्ता साफ करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

Yamunotri Highway

NH के अधिशासी अभियंता मनोज रावत और निर्माण एजेंसी के परियोजना प्रबंधक गोपाली श्रीनिवासुलू रेड्डी ने बताया कि मशीनों की मदद से मलबा हटाने का काम लगातार जारी है। अधिकारियों का कहना है कि जल्द से जल्द यातायात बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है।

Yamunotri Highway

भू-धंसाव के कारण 11 केवी की विद्युत लाइन भी क्षतिग्रस्त हो गई। इससे यमुनोत्री धाम के साथ गीठ पट्टी के 12 गांवों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई है। विद्युत विभाग की ओर से लाइन को दुरुस्त करने की तैयारी की जा रही है। सड़क बंद होने के कारण राहत और मरम्मत कार्यों में भी चुनौती आ रही है। नेपाल और तिब्बत में कुछ दिन पहले हुई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद उत्तरकाशी के ग्लेशियर क्षेत्रों में बनी छोटी झीलों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।

गंगा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख तथा केदारताल क्षेत्र में बनी झीलों की निगरानी बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि चार से पांच हजार मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश का पैटर्न बदल रहा है, जिससे इन झीलों में पानी बढ़ सकता है।

मलबे पर बनी झीलें

गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख क्षेत्र में गंगा के उद्गम के आसपास ग्लेशियर से जमा मलबे पर छोटी-छोटी झीलें दिखाई दे रही हैं। इसी तरह केदारताल क्षेत्र में भी कई जलाशय बने हैं। पर्यावरणविद सुरेश भाई के मुताबिक गंगोत्री घाटी और आसपास का ग्लेशियर क्षेत्र पहले से संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में अचानक बारिश बढ़ने से इन क्षेत्रों में अतिरिक्त खतरा पैदा हो सकता है। पर्यावरणविदों का कहना है कि पहले चार से पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर हल्की बारिश के साथ बर्फबारी होने की स्थिति अधिक सामान्य थी।

अब ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे ग्लेशियर के मलबे के बीच बनी झीलों में पानी का स्तर बढ़ने की आशंका रहती है। यदि किसी झील का प्राकृतिक बांध कमजोर हुआ तो अचानक पानी नीचे की ओर आने का खतरा पैदा हो सकता है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की मांग

गंगा विचार मंच के प्रांत संयोजक लोकेंद्र बिष्ट और गोमुख से लौटे ग्राम प्रहरी प्रखर बिष्ट ने सरकार से इन झीलों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार निगरानी के साथ अर्ली वार्निंग सिस्टम भी स्थापित किया जाना चाहिए, ताकि संभावित खतरे की जानकारी समय रहते नीचे के इलाकों तक पहुंच सके। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक मनीष मेहता के अनुसार गोमुख और केदारताल क्षेत्र में बनी झीलें सुपरा ग्लेशियर झीलें हैं।

इनमें से ज्यादातर झीलें अस्थायी प्रकृति की होती हैं। इसलिए फिलहाल इनसे बड़े खतरे की आशंका नहीं मानी जा रही है। हालांकि संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र को देखते हुए वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है।

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