Independence Day Story : स्वतंत्रता दिवस पर उन परिवारों की आंखें नम हो जाती हैं, जिनके बुजुर्गों ने देश की आजादी के लिए जेल की सजा काटी, अंग्रेजों की यातनाएं सहीं और विभाजन की त्रासदी को अपनी आंखों से देखा। इनकी कहानियां आज भी नई पीढ़ी को देश के लिए किए गए त्याग की याद दिलाती हैं। नोएडा के सेक्टर-137 स्थित सुपरटेक इकोसिटी निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य और एनसीसी मेजर सरोज जोशी हर स्वतंत्रता दिवस पर अपने पिता गंगा दत्त शर्मा को याद करती हैं। उनके पिता 1939 में कांग्रेस से जुड़े और अगले वर्ष अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने पिथौरागढ़ में सक्रिय भूमिका निभाई और गांधीवादी विचारधारा का प्रचार किया। इसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर छह महीने की कठोर सजा दी गई। सरोज जोशी ने भी पिता के विचारों को आगे बढ़ाते हुए युवतियों को सेना में जाने के लिए प्रेरित किया।
Independence Day Story
मेरठ के मवाना निवासी क्रांतिकारी विष्णु शरण दुबलिश का परिवार अब नोएडा में रहता है। उनके पौत्र राजीव दुबलिश बताते हैं कि काकोरी कांड से जुड़े मामले में उनके दादा को गिरफ्तार किया गया था और करीब 20 साल जेल में रहना पड़ा। अंग्रेजों ने उन्हें कई तरह की यातनाएं दीं, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। जेलर विलियमसन भी उनकी लोकप्रियता से नाराज रहता था। दुबलिश अक्सर कहा करते थे, “हम लोहे के चने हैं।” नोएडा के बरौला निवासी राज सिंह के पिता इंद्रजीत सिंह भारतीय सेना में थे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद 1962 के चीन युद्ध में भी हिस्सा लिया।
युद्ध के दौरान वह चीनी सैनिकों के कब्जे में चले गए और करीब एक साल तक कैद रहे। इस दौरान उन्हें गंभीर यातनाएं झेलनी पड़ीं। समझौते के बाद उनकी रिहाई हुई। उनके बेटे बताते हैं कि पिता अक्सर युद्ध के दौरान के अनुभव सुनाया करते थे।
त्रासदी को आंखों से देखा
दर्शन लाल वोहरा ने विभाजन के दौर की भयावह तस्वीरें अपनी आंखों से देखी थीं। रावलपिंडी से अपने पिता के साथ हरिद्वार आते समय उन्होंने रास्ते में जलते घर और हिंसा के मंजर देखे। उस समय वह काफी छोटे थे, लेकिन वे दृश्य आज भी उनकी यादों में बसे हैं। बाद में उनका परिवार बुलंदशहर क्षेत्र में आकर बस गया और वर्तमान में नोएडा में रह रहा है। स्वर्गीय लाल सिंह पहले अंग्रेजी सेना में रहे, लेकिन बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से जुड़ गए। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आजादी के बाद भारत लौट आए। वर्ष 2008 में उनका निधन हुआ। उनके पौत्र राजीव चौधरी आज भी दादा के संघर्ष और देशभक्ति को परिवार की सबसे बड़ी विरासत मानते हैं।
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