West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान अब विधानसभा से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे की ओर से 10 बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की गई है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर रथिंद्र बोस से सीधे कोई नया आदेश जारी करने के बजाय उम्मीद जताई है कि वह पहले से निर्धारित समयसीमा के भीतर उचित फैसला करेंगे। बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की याचिकाएं 8 जुलाई को दाखिल की गई थीं और तीन महीने की अवधि अक्टूबर के शुरुआती दिनों में पूरी हो रही है। 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ा राजनीतिक विभाजन सामने आया था।
पार्टी के कई विधायक अलग खेमे में चले गए और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व को समर्थन दिया। इसी विवाद के बीच ममता खेमे के विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने 10 विधायकों के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग करते हुए विधानसभा अध्यक्ष के सामने याचिका दाखिल की।
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लंबे समय तक फैसला नहीं आने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान 2020 के कीशम मेघचंद्र सिंह मामले में दिए गए फैसले का जिक्र किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सामान्य परिस्थितियों में दलबदल से जुड़ी अयोग्यता याचिकाओं पर स्पीकर को उचित अवधि के भीतर और सामान्यतः तीन महीने में निर्णय करना चाहिए। बंगाल मामले में अदालत ने कहा कि उसे विश्वास है कि विधानसभा अध्यक्ष इस न्यायिक व्यवस्था से पूरी तरह अवगत हैं और तय अवधि में उचित निर्णय लेने का प्रयास करेंगे।
तृणमूल कांग्रेस के भीतर विवाद केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। लोकसभा में पार्टी के 20 बागी सांसदों की सदस्यता को लेकर भी अलग मामला चल रहा है। अभिषेक बनर्जी ने इन सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने याचिकाएं दी हैं। आरोप है कि इन सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI के साथ जाने का फैसला किया। सांसदों ने अपने लिए अलग संसदीय पहचान की मांग की है, जबकि ममता खेमा इसे दलबदल विरोधी कानून का मामला बता रहा है।
संवैधानिक अथॉरिटी
दोनों मामलों में बड़ा अंतर फैसला लेने वाली संवैधानिक अथॉरिटी का है। राज्य के विधायकों की अयोग्यता से जुड़ी याचिका पर पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर को फैसला करना है, जबकि सांसदों से संबंधित मामला लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों के मामले में भी जल्द फैसला होने की अपेक्षा जताई है। इसके बाद लोकसभा सचिवालय ने 20 बागी सांसदों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 8 अक्टूबर तक का समय दिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के भीतर विभाजन का असर संख्या बल पर भी पड़ा है। जून में सामने आए घटनाक्रम के दौरान पार्टी के 58 विधायकों ने एक संयुक्त पत्र के जरिए ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने का समर्थन किया था। विधानसभा अध्यक्ष ने भी उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी। इसके खिलाफ ममता खेमे की ओर से कानूनी चुनौती दी गई, लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने तत्काल अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था।
दसवीं अनुसूची बेहद महत्वपूर्ण
इस पूरे विवाद में संविधान की दसवीं अनुसूची बेहद महत्वपूर्ण है। इसी में विधायकों और सांसदों के दलबदल से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। किसी सदस्य ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ी है या सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन किया है, जैसी परिस्थितियां अयोग्यता का आधार बन सकती हैं। वहीं, दो-तिहाई सदस्यों के किसी दूसरी पार्टी में विलय से जुड़े मामलों के लिए अलग प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए केवल संख्या के आधार पर किसी गुट को स्वतः अयोग्यता से सुरक्षित मान लेना पर्याप्त नहीं है। अंतिम फैसला मामले के तथ्यों और दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के आधार पर संबंधित स्पीकर को करना होता है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने सीधे यह फैसला नहीं सुनाया कि बंगाल के 10 विधायक अयोग्य हैं या नहीं। दसवीं अनुसूची के तहत इस सवाल पर शुरुआती निर्णय विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर होना है। हालांकि, स्पीकर का निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर नहीं होता। फैसला आने के बाद उसे संवैधानिक और कानूनी आधार पर अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
पार्टी छोड़ने का संकेत
इस मामले में ममता बनर्जी खेमे का आरोप है कि संबंधित विधायकों ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लिया, जिनसे उनके पार्टी छोड़ने का संकेत मिलता है। दूसरी ओर, बागी खेमे ने विधानसभा के भीतर अपने संख्या बल और अलग राजनीतिक दावों के आधार पर अपना पक्ष मजबूत बताया है। इन दोनों दावों में किसका कानूनी पक्ष स्वीकार किया जाएगा, इसका फैसला विधानसभा अध्यक्ष की कार्यवाही के बाद स्पष्ट होगा। पश्चिम बंगाल की इस राजनीतिक लड़ाई में अब विधानसभा अध्यक्ष का फैसला बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्वयं अयोग्यता पर निर्णय देने के बजाय स्पीकर से निर्धारित समय के भीतर प्रक्रिया पूरी करने की अपेक्षा जताई है। स्पीकर का फैसला चाहे जिस पक्ष में आए, उसके बाद मामला दोबारा अदालत पहुंचने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में 10 बागी विधायकों की सदस्यता का सवाल आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति और कानूनी लड़ाई, दोनों के केंद्र में बना रह सकता है।




