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Dasheri Mango: 300 साल पुराने ‘मदर ट्री’ से शुरू हुई थी दशहरी आम की कहानी, इस बार महंगा मिलेगा फलों का राजा

Dussehri Mango

Dasheri Mango : गर्मी का मौसम शुरू होते ही अगर किसी फल का सबसे ज्यादा इंतजार किया जाता है तो वह आम है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक… हर उम्र के लोग फलों के राजा का स्वाद चखने के लिए बेसब्री से इंतजार करते हैं। उत्तर भारत में दशहरी आम का नाम सुनते ही लोगों के मुंह में पानी आ जाता है। इसकी मिठास, खुशबू और रसीला स्वाद इसे बाकी किस्मों से अलग बनाता है। यही वजह है कि देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक मलिहाबाद का दशहरी आम अपनी पहचान बना चुका है। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस दशहरी आम को आज दुनिया भर में पसंद किया जाता है, उसकी कहानी एक छोटे से गांव और एक ऐतिहासिक पेड़ से जुड़ी हुई है। यह कहानी केवल एक फल की नहीं बल्कि सैकड़ों साल पुरानी विरासत, खेती और परंपरा की भी कहानी है। आज भी लखनऊ के पास मौजूद एक पेड़ को दशहरी आम का ‘मदर ट्री’ कहा जाता है, जहां से इस मशहूर आम की यात्रा शुरू होने का दावा किया जाता है।

Dussehri Mango

लखनऊ से करीब 22 किलोमीटर दूर हरदोई हाईवे पर स्थित काकोरी कस्बे के अंतर्गत आने वाले दशहरी गांव में एक ऐसा आम का पेड़ खड़ा है, जिसे स्थानीय लोग दुनिया का सबसे पुराना दशहरी आम का पेड़ बताते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इसकी उम्र लगभग 300 साल है। यही वह पेड़ है जिसे दशहरी आम की मूल पहचान और शुरुआत का आधार माना जाता है। वर्षों से यह पेड़ गांव की पहचान बना हुआ है और आम प्रेमियों के बीच आकर्षण का केंद्र भी है।

Dasheri Mango

स्थानीय लोगों के अनुसार, कई पीढ़ियों से एक कहानी सुनाई जाती रही है कि अफगानिस्तान के कंधार क्षेत्र से आए फकीर मोहम्मद खान उर्फ गोया का इस आम से विशेष संबंध रहा। बताया जाता है कि गोया अपने समुदाय के साथ भारत आए और बाद में टोंक रियासत की सेना का हिस्सा बने। उनकी बहादुरी और युद्ध कौशल से प्रभावित होकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने उन्हें अपने साथ शामिल कर लिया और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपीं। कहा जाता है कि एक बार गोया लखनऊ से मलिहाबाद की ओर जा रहे थे। रास्ते में काकोरी के दशहरी गांव में विश्राम के दौरान उन्होंने एक विशाल आम के पेड़ से फल खाया।

Dasheri Mango

उस पेड़ के मालिक पुरुषोत्तम ने उन्हें आम चखने के लिए दिए। आम का स्वाद गोया को इतना पसंद आया कि उन्होंने मलिहाबाद में भी इसी किस्म के पेड़ लगाने की योजना बनाई। बाद में नवाब से अनुमति मिलने पर वहां दशहरी आम के बाग लगाए गए और धीरे-धीरे यह इलाका आम उत्पादन का बड़ा केंद्र बन गया।

मलिहाबाद बना देश का सबसे बड़ा दशहरी बेल्ट

समय के साथ दशहरी आम की खेती लगातार बढ़ती गई। जो शुरुआत कुछ पेड़ों से हुई थी, वह अब हजारों किसानों की आजीविका का आधार बन चुकी है। आज मलिहाबाद क्षेत्र में लगभग 46 हजार बीघा से अधिक भूमि पर आम की खेती की जाती है। यहां पैदा होने वाला दशहरी आम देश के कई राज्यों के अलावा विदेशों में भी भेजा जाता है। इसी वजह से मलिहाबाद को दशहरी आम की राजधानी भी कहा जाता है। इस साल हालांकि आम उत्पादकों के सामने चुनौती खड़ी हो गई है। किसानों का कहना है कि आंधी और बेमौसम बारिश के कारण पेड़ों पर फल लगने की प्रक्रिया प्रभावित हुई। सामान्य वर्षों की तुलना में इस बार केवल करीब 40 प्रतिशत पेड़ों पर ही संतोषजनक मात्रा में आम आया है। कई बागों में फल झड़ने और फूलों को नुकसान पहुंचने से उत्पादन में भारी कमी दर्ज की गई है।

Dasheri Mango

बाजार में बढ़ सकते हैं दशहरी आम के दाम

पैदावार घटने का सीधा असर बाजार पर दिखाई देने की संभावना है। किसानों और व्यापारियों का अनुमान है कि कम आपूर्ति के कारण इस बार दशहरी आम की कीमतें पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक रह सकती हैं। जो आम आमतौर पर 50 से 60 रुपये प्रति किलो के आसपास बिकता था, वह इस सीजन में 100 से 120 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकता है। ऐसे में आम प्रेमियों को इस बार अपने पसंदीदा फल के लिए पहले से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। दशहरी गांव का वह पुराना पेड़ केवल एक वृक्ष नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की कृषि विरासत का प्रतीक माना जाता है। इसी से जुड़ी कहानी ने मलिहाबाद को विश्व मानचित्र पर पहचान दिलाई और हजारों किसानों को रोजगार का माध्यम दिया। भले ही इस बार मौसम ने उत्पादन को प्रभावित किया हो, लेकिन दशहरी आम की लोकप्रियता आज भी पहले जैसी ही बनी हुई है। यही कारण है कि हर साल इसकी पहली खेप बाजार में आते ही खरीदारों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

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