Vedic Vivah : हिंदू धर्म में वैदिक विवाह को सबसे पवित्र संस्कार माना गया है। यह दो लोगों की शादी नहीं, बल्कि 2 परिवारों, 2 परंपराओं और 2 आत्माओं का मिलन होता है। वैदिक विवाह का मतलब जीवन भर साथ निभाने का संकल्प है, जो कि अग्नि को साक्षी मानकर किया जाता है। पूरी कायनात इसकी साक्षी बनती है। बता दें कि इसे आध्यात्मिक बंधन कहा जाता है। लोग अब फिर से सादगी और संस्कारों की ओर लौट रहे हैं।
वैदिक विवाह की जड़ें वेदों में मिलती हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विवाह से जुड़े मंत्र और विधियां बताई गई हैं। इन मंत्रों का मकसद पति-पत्नी के जीवन में संतुलन, प्रेम, जिम्मेदारी और धर्म का पालन करना होता है। इसलिए वैदिक विवाह को जीवन का मजबूत आधार माना गया है।
Vedic Vivah: अलग होता है महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, वैदिक विवाह चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की राह खोलता है। शादी के बाद व्यक्ति सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि परिवार और समाज के लिए भी जिम्मेदार बनता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि विवाह के जरिए व्यक्ति अपने तीन ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण चुकाने की दिशा में आगे बढ़ता है। वैदिक विवाह की उन रस्मों की, जिनका अपना अलग महत्व है।
ये है रस्म
- सबसे पहले कन्यादान होता है। इसमें पिता अपनी बेटी का हाथ वर के हाथों में सौंपते हैं। इसे सबसे बड़ा दान कहा गया है। इसका भाव यह होता है कि पिता अपनी सबसे प्रिय चीज जीवन भर की जिम्मेदारी के साथ सौंप रहा है।
- इसके बाद पाणिग्रहण रस्म होती है। इसमें वर वधू का हाथ थामता है। यह संकेत होता है कि दोनों एक-दूसरे को पूरी तरह स्वीकार कर रहे हैं और सुख-दुख में साथ निभाएंगे।
- फेरे वैदिक विवाह की सबसे अहम रस्म मानी जाती है। वर-वधू अग्नि के चारों ओर घूमते हैं और हर फेरे के साथ जीवन से जुड़े वचन लेते हैं। भोजन, स्वास्थ्य, धन, सुख-दुख, संतान, साथ और मित्रता से जुड़ी है। अग्नि देव यहां गवाह होते हैं, इसलिए इन वचनों को बेहद पवित्र माना जाता है।
- लाजाहोम में वधू का भाई उसके हाथों में लावा डालता है और दंपती मिलकर अग्नि में आहुति देते हैं। यह रस्म समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना से जुड़ी होती है।
- शिलारोहण रस्म में वधू एक पत्थर पर पैर रखती है। इसका मतलब होता है कि वह जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी अडिग और मजबूत बनी रहेगी।
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