UP Politics : देश की राजनीति में इन दिनों Gen Z यानी नई युवा पीढ़ी को लेकर चर्चा तेज है। केंद्र से लेकर राज्यों तक राजनीतिक दल युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि आने वाले समय में यही युवा वोटर चुनावी समीकरणों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। पार्टियां जहां इस पीढ़ी की पसंद और मुद्दों को समझने की कोशिश कर रही हैं, वहीं एक सवाल यह भी है कि मौजूदा विधानसभाओं में Gen Z की हिस्सेदारी कितनी है।
अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो 403 सदस्यों वाली विधानसभा में Gen Z विधायकों की संख्या बेहद कम है। फिलहाल तकनीकी तौर पर सिर्फ दो विधायक इस पीढ़ी में आते हैं। हालांकि, 2022 में सबसे कम उम्र में चुनाव जीतने वाले एक विधायक अब उम्र की सीमा पार कर चुके हैं इसलिए उन्हें मौजूदा Gen Z विधायक नहीं माना जा सकता।
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गाजीपुर की सैदपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के विधायक अंकित भारती मौजूदा Gen Z विधायकों में शामिल हैं। उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के तत्कालीन प्रत्याशी और सैदपुर से दो बार विधायक रह चुके सुभाष पासी को करीब 35 हजार वोटों के अंतर से हराया था। चुनाव में अंकित भारती को 1,07,426 वोट मिले थे, जबकि भाजपा प्रत्याशी सुभाष पासी के खाते में 72,132 वोट आए थे। जीत के साथ ही अंकित भारती प्रदेश के सबसे युवा विधायकों में शामिल हो गए थे। कम उम्र में विधानसभा पहुंचने के कारण वह युवाओं के बीच भी चर्चा में रहे।
Gen Z विधायक
दूसरा नाम समाजवादी पार्टी के राहुल राजपूत का है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने उन्हें रायबरेली की हरचंदपुर विधानसभा सीट से मैदान में उतारा था। राहुल राजपूत ने चुनाव जीतकर विधानसभा में अपनी जगह बनाई और उस समय उन्हें सबसे युवा विधायकों में गिना गया। कम उम्र में चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने वाले इन दोनों नेताओं की मौजूदगी यह बताती है कि युवा चेहरों के लिए राजनीति में जगह बनाना संभव है, लेकिन संख्या अभी भी काफी सीमित है।
श्रेणी से बाहर
2022 के चुनाव में एक विधायक ने महज 26 साल की उम्र में जीत दर्ज की थी और उस समय वह सबसे युवा विधायकों में शामिल थे। लेकिन अब उनकी उम्र करीब 30 साल हो चुकी है इसलिए मौजूदा उम्र के आधार पर उन्हें Gen Z विधायक की श्रेणी में रखना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। राजनीतिक दलों में युवाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद विधानसभा तक पहुंचने वाले Gen Z नेताओं की संख्या कम होने के पीछे कई वजहें हैं। सबसे बड़ी चुनौती चुनावी टिकट हासिल करना है। राजनीतिक दल आमतौर पर उम्मीदवारों को टिकट देने से पहले उनके संगठनात्मक अनुभव, राजनीतिक पकड़ और चुनावी क्षमता को भी देखते हैं। ऐसे में 25-26 साल की उम्र में किसी युवा को विधानसभा चुनाव का टिकट मिलना अब भी काफी दुर्लभ है।
दूसरी वजह यह है कि राजनीति को शुरुआत से ही करियर के तौर पर चुनने वाले युवाओं की संख्या सीमित है। कई युवा जब सक्रिय राजनीति में आने का फैसला करते हैं, तब तक उनकी उम्र Gen Z की सीमा से आगे निकल चुकी होती है।
ये है हालात
निर्दलीय उम्मीदवारों के तौर पर भी कई युवाओं ने चुनावी मैदान में किस्मत आजमाई है, लेकिन विधानसभा तक पहुंचने में उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। यही वजह है कि यूपी जैसे बड़े राज्य की 403 सदस्यीय विधानसभा में Gen Z विधायकों की मौजूदगी फिलहाल बेहद छोटी है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल युवा चेहरों को कितना मौका देते हैं और क्या Gen Z की राजनीतिक भागीदारी सिर्फ वोटर के तौर पर रहेगी या विधानसभा में भी उनकी संख्या बढ़ेगी।
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