UP Election : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ सीट बंटवारे को लेकर रणनीति लगभग तय कर ली है। पार्टी 403 विधानसभा सीटों में से करीब 75 से 80 सीटें अपने सहयोगियों के लिए छोड़ सकती है। ऐसे में भाजपा खुद लगभग 323 से 328 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। पिछले चार विधानसभा चुनावों में यह पहली बार होगा, जब भाजपा इतनी कम सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और महामंत्री संगठन बीएल संतोष ने 4 और 5 जुलाई को लखनऊ का दौरा किया था। इस दौरान होटल ताज में NDA के सहयोगी दलों के नेताओं के साथ सीट बंटवारे को लेकर चर्चा हुई।
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बैठक में रालोद, अपना दल (एस), सुभासपा और निषाद पार्टी के नेताओं ने सीटों का बंटवारा चुनाव से काफी पहले करने की जरूरत बताई, ताकि प्रत्याशियों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल सके और स्थानीय स्तर पर टकराव की स्थिति न बने।
चारों सहयोगियों का दावा
रालोद: 2022 में सपा के साथ गठबंधन में रालोद ने 33 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 8 सीटें जीती थीं। उपचुनाव के बाद उसके पास 9 सीटें हैं। पार्टी करीब 20 अन्य सीटों पर भी दावा कर रही है। उसे करीब 20 सीट मिलने की संभावना जताई जा रही है।
अपना दल (एस): 2022 में पार्टी ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर 12 पर जीत दर्ज की थी। उपचुनाव में एक और सीट मिलने के बाद उसके पास 13 सीटें हैं। पार्टी 25 अतिरिक्त सीटों पर दावा कर रही है और करीब 25 सीट मिलने की संभावना है।
सुभासपा: 2022 में सपा गठबंधन के साथ 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली सुभासपा ने 6 सीटें जीती थीं। इस बार पार्टी करीब 65 सीटों पर तैयारी कर रही है। हालांकि गठबंधन में उसे 15 से 17 सीटें मिलने की संभावना है।
निषाद पार्टी: 2022 में 16 सीटों पर चुनाव लड़ने और 6 सीट जीतने वाली निषाद पार्टी करीब 30 सीटों पर दावा कर रही है। उसे गठबंधन में 15 से 18 सीट मिलने की संभावना जताई जा रही है।
वोट पर नजर
भाजपा की रणनीति में सहयोगी दलों की भूमिका काफी अहम है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं के बीच रालोद को महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं पूर्वांचल में राजभर और निषाद समुदाय के वोट को साधने में सुभासपा और निषाद पार्टी की भूमिका अहम हो सकती है। समाजवादी पार्टी के PDA समीकरण का मुकाबला करने के लिए भाजपा इन दलों के साथ गठबंधन को मजबूत रखना चाहती है।
भाजपा की कोशिश अपनी मजबूत मौजूदा सीटों को सुरक्षित रखने की है। पार्टी के नेताओं के मुताबिक 2022 में जिन 115 सीटों पर भाजपा को हार मिली थी, उनमें करीब 65 से 70 सीटें ऐसी हैं, जहां सामाजिक समीकरण पार्टी के खिलाफ माने जाते हैं। इन्हें ‘C’ श्रेणी की सीटें बताया जा रहा है। भाजपा इन कमजोर सीटों में से कई सहयोगी दलों को देने की रणनीति पर काम कर रही है।
बढ़ेगी नाराजगी
सीट बंटवारे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी संभालना होगी। खासकर पूर्वांचल की कुछ ऐसी सीटें हैं, जिन पर भाजपा को मजबूत माना जाता है, लेकिन सहयोगी दल उन पर दावा कर रहे हैं। इन सीटों को गठबंधन में देने पर स्थानीय नेताओं के विरोध की आशंका बनी रहेगी।
भाजपा ने संभावित बगावत रोकने के लिए कार्यकर्ताओं के समायोजन की योजना भी बनाई है। जिन सीटों पर भाजपा संगठन के मजबूत नेताओं और कार्यकर्ताओं के बजाय सहयोगी दलों के उम्मीदवार उतरेंगे, वहां पार्टी कार्यकर्ताओं को सरकार बनने पर विधान परिषद भेजने या विभिन्न बोर्ड, निगम और आयोगों में जिम्मेदारी देने का भरोसा दिया जा सकता है।
बनाई जा रही रणनीति
रालोद और अपना दल (एस) अपने कैडर के नेताओं को ही उम्मीदवार बनाने पर जोर दे रहे हैं। विशेष परिस्थितियों में ही भाजपा के किसी कार्यकर्ता को उनके चुनाव चिह्न पर उतारने की संभावना होगी। दूसरी ओर सुभासपा और निषाद पार्टी के हिस्से में आने वाली कुछ सीटों पर भाजपा अपने संगठन के नेताओं को सहयोगी दल के सिंबल से मैदान में उतार सकती है। इस तरह भाजपा गठबंधन भी बनाए रखना चाहती है और अपने मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क का इस्तेमाल भी करना चाहती है।
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