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Exoplanet Radio Signal: 63 प्रकाश-वर्ष दूर ग्रह से पहली बार सीधे मिला रेडियो सिग्नल, मिलेगा नया रास्ता

Exoplanet Radio Signal

Exoplanet Radio Signal : ब्रह्मांड में पृथ्वी अकेली है या कहीं और भी जीवन मौजूद है, इस सवाल का जवाब वैज्ञानिक दशकों से तलाश रहे हैं। अब खगोलविदों को एक ऐसी सफलता मिली है, जिसने सौर मंडल के बाहर मौजूद ग्रहों को समझने का नया रास्ता खोल दिया है। वैज्ञानिकों ने पहली बार किसी एक्सोप्लैनेट से सीधे आने वाले रेडियो सिग्नल का पता लगाने का दावा किया है। हालांकि यह किसी एलियन सभ्यता का भेजा संदेश नहीं है, बल्कि ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी प्राकृतिक प्रक्रिया का नतीजा माना जा रहा है।

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हार्वर्ड और स्मिथसोनियन के सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स तथा यूनिवर्सिटी ऑफ ओरेगन से जुड़े शोधकर्ताओं ने इस रेडियो सिग्नल की पहचान की है। एक्सोप्लैनेट वाले सिस्टम से पहले भी रेडियो संकेत मिले हैं, लेकिन यह तय करना मुश्किल रहा कि वे ग्रह से निकले थे या उसके होस्ट स्टार से।

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नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने सिग्नल के स्रोत को ग्रह से जोड़ने वाले मजबूत प्रमाण मिलने की बात कही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह रेडियो सिग्नल एलियंस से जुड़ा नहीं है। इसके पीछे ऑरोरा को संभावित कारण माना गया है। जब चार्ज्ड पार्टिकल्स किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र और उसके आसपास के वातावरण से इंटरैक्ट करते हैं तो ऊर्जा निकल सकती है। पृथ्वी पर भी इसी तरह की प्रक्रिया से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के पास खूबसूरत ऑरोरा दिखाई देते हैं।

रिसर्च टीम ने 0.85 से 3.5 गीगाहर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी के बीच तेजी से दोहराए जाने वाले रेडियो बर्स्ट दर्ज किए। इनमें काफी ज्यादा सर्कुलर पोलराइजेशन भी पाया गया, जिसे ऑरोरल रेडियो एमिशन की महत्वपूर्ण पहचान माना जाता है। ये ऑब्जर्वेशन 2025 और 2026 में चार अलग-अलग मौकों पर किए गए।

शक्तिशाली टेलीस्कोप से सफलता

इन रहस्यमयी रेडियो तरंगों को पकड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका स्थित MeerKAT रेडियो टेलीस्कोप ऐरे का इस्तेमाल किया गया। वैज्ञानिकों का ध्यान बीटा पिक्टोरिस नाम के तारे पर था। यह तारा पृथ्वी से करीब 63.4 प्रकाश-वर्ष दूर मौजूद है और इसके आसपास कई ग्रहों की पहचान की जा चुकी है। ऑब्जर्वेशन के दौरान वैज्ञानिकों ने छोटे लेकिन बार-बार दोहराए जाने वाले रेडियो बर्स्ट देखे। इनके गुणों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ताओं ने इन्हें बीटा पिक्टोरिस b से जोड़कर देखा है। यह ग्रह खगोलविदों के लिए नया नहीं है। इसकी खोज 2008 में हुई थी और तभी से वैज्ञानिक इसकी संरचना और विशेषताओं का अध्ययन करते रहे हैं।

बृहस्पति से करीब 10 गुना भारी

बीटा पिक्टोरिस b एक विशाल ग्रह है और इसका द्रव्यमान बृहस्पति से करीब 10 गुना बताया जाता है। यह अपनी धुरी पर बेहद तेजी से घूमता है और लगभग 8 से 9 घंटे में एक चक्कर पूरा कर लेता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी तेज घूर्णन गति इसके शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र और रेडियो एमिशन में भूमिका निभा सकती है। रिसर्च के मुताबिक, बीटा पिक्टोरिस b का मैग्नेटिक फील्ड पृथ्वी की तुलना में हजारों गुना ज्यादा शक्तिशाली हो सकता है। वैज्ञानिक इसे किसी एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत का पहला प्रत्यक्ष माप बता रहे हैं। यह नतीजा युवा और विशाल ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र को लेकर पहले तैयार किए गए वैज्ञानिक मॉडलों से भी मेल खाता है। इस खोज का मतलब यह नहीं है कि बीटा पिक्टोरिस b पर जीवन मिल गया है।

चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह किसी ग्रह के वातावरण और उसके विकास को समझने में मदद कर सकता है। नई तकनीक के जरिए अगर दूसरे एक्सोप्लैनेट्स से भी ऐसे रेडियो संकेत पकड़े जाते हैं तो वैज्ञानिक सौर मंडल के बाहर मौजूद दुनिया के चुंबकीय वातावरण को पहले से कहीं बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।

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