Saudi Arabia Crisis : यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों ने सऊदी अरब के सामने नई सुरक्षा चुनौती खड़ी कर दी है। दक्षिणी इलाकों में ड्रोन और मिसाइल हमलों के साथ अब लाल सागर के अहम समुद्री मार्ग को लेकर भी खतरा बढ़ गया है। ऐसे समय में रियाद को जिस अमेरिकी सैन्य मदद की उम्मीद थी, उस पर फिलहाल कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला है। सऊदी अरब ने हूती ठिकानों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नया सैन्य मोर्चा खोलने से दूरी बनाए रखी है।
अमेरिका फिलहाल सऊदी को खुफिया और तकनीकी स्तर पर मदद देने पर जोर दे रहा है। वाशिंगटन की प्राथमिकता ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच यमन में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचने की दिखाई दे रही है।
Saudi Arabia Crisis
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते की भी इस संकट के दौरान परीक्षा हो रही है। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने को सभी पर हमला माना गया है। हालांकि, पाकिस्तान ने स्पष्ट किया है कि हूती हमलों के जवाब में समझौते के तहत तत्काल सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा नहीं हुई है। पाकिस्तान का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मक्का समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक नई व्यवस्था के तौर पर पेश किया गया था। मौजूदा संकट में इस्लामाबाद ने सऊदी अरब के खिलाफ हमलों की निंदा जरूर की है, लेकिन अभी सीधे सैन्य हस्तक्षेप की घोषणा नहीं की है। इससे समझौते की वास्तविक सैन्य भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
मंडरा रहा खतरा
हूती गतिविधियों का सबसे बड़ा असर लाल सागर और बाब अल-मंदेब क्षेत्र में दिखाई दे सकता है। यमन में हूती लड़ाकों की बढ़त ने इस महत्वपूर्ण समुद्री गलियारे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यह रास्ता वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पहले से तनाव की चपेट में है, ऐसे में बाब अल-मंदेब पर दबाव बढ़ने से संकट और गंभीर हो सकता है। सऊदी अरब के लिए चुनौती केवल सीमा और समुद्री सुरक्षा तक सीमित नहीं है। हाल के हमलों के बाद देश की महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन को भी अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। यह पाइपलाइन सऊदी तेल को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से अलग रास्ते से निर्यात करने में मदद करती है। ऐसे में इसके संचालन में रुकावट का असर ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
ईरान कनेक्शन को लेकर बढ़ी चिंता
हूती संगठन को ईरान समर्थित समूह माना जाता है और मौजूदा क्षेत्रीय संघर्ष में तेहरान की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान पर दबाव बढ़ने के साथ उसके सहयोगी संगठन क्षेत्र में अलग-अलग मोर्चों पर सक्रिय हो रहे हैं। हूतियों की गतिविधियां भी इसी व्यापक क्षेत्रीय टकराव का हिस्सा बनती दिखाई दे रही हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब आर्थिक बदलाव और निवेश को बढ़ावा देकर देश को वैश्विक कारोबारी केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन लगातार बढ़ते क्षेत्रीय सैन्य तनाव ने सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती पर सवाल खड़े किए हैं। ऊर्जा ढांचे और समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ने से आर्थिक महत्वाकांक्षाओं पर भी असर पड़ सकता है।
एक साथ कई मोर्चों पर दबाव
सऊदी अरब इस समय ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनाव, हूती हमलों और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है, जबकि पाकिस्तान ने मक्का समझौते के बावजूद तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया से इनकार किया है। ऐसे में रियाद के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने सुरक्षा हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय संघर्ष को और फैलने से रोकने की है।
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