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UP Politics: उरई में BJP की हैट्रिक या SP का उलटफेर? 2024 के नतीजों ने बढ़ाई 2027 की टेंशन

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UP Politics : जालौन जिले की उरई सुरक्षित विधानसभा सीट पर 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सियासी हलचल तेज है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने यहां अपना दबदबा कायम रखा है। भाजपा के गौरी शंकर वर्मा ने 2017 और 2022 में लगातार जीत दर्ज की थी। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों ने इस सीट की राजनीतिक तस्वीर में नया मोड़ ला दिया। लोकसभा चुनाव के दौरान उरई विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी नारायण दास अहिरवार ने भाजपा उम्मीदवार पर बढ़त बनाई थी।

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ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा विकास कार्यों और योगी सरकार के कामकाज के सहारे लगातार तीसरी जीत दर्ज कर पाएगी या सपा लोकसभा चुनाव की बढ़त को विधानसभा चुनाव में भी कायम रखेगी।

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उरई की सियासत को समझने के लिए पिछले कुछ दशकों के चुनावी इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। 1990 के दशक में जालौन जिले की कई विधानसभा सीटों पर बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव मजबूत था और उरई को भी बसपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता था। समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदले और 2012 के परिसीमन के बाद विधानसभा सीटों की तस्वीर भी बदल गई। 2012 में समाजवादी पार्टी के दयाशंकर वर्मा ने उरई सीट पर जीत हासिल की। इसके बाद मुकाबला धीरे-धीरे भाजपा और सपा के बीच सिमटता गया। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के गौरी शंकर वर्मा ने जीत दर्ज की, जबकि सपा प्रत्याशी दोनों चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे। इस तरह पिछले एक दशक में उरई में भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की है।

जीत का आधार

मौजूदा भाजपा विधायक गौरी शंकर वर्मा 2027 में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आते हैं। उनका कहना है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने पर काम हुआ है। उनके मुताबिक विधानसभा क्षेत्र में सड़कों का विस्तार, मोक्षधाम का विकास और उरई के प्रमुख प्रवेश द्वारों का सौंदर्यीकरण कराया गया है।

विधायक का दावा है कि वह लगातार क्षेत्र में लोगों के बीच पहुंच रहे हैं और गांवों में चौपाल के जरिए जनता से संवाद कर रहे हैं। उनका मानना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के काम और स्थानीय स्तर पर हुए विकास के आधार पर मतदाता भाजपा को एक बार फिर मौका देंगे।

बढ़त से उम्मीद

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी 2027 में उरई सीट पर वापसी की कोशिश में जुटी है। सपा नेताओं का कहना है कि 2022 में पार्टी को बड़ी संख्या में वोट मिले थे, लेकिन संगठन अपनी बात पूरी तरह मतदाताओं तक नहीं पहुंचा सका। अब पार्टी कार्यकर्ताओं को गांव-गांव सक्रिय करने पर जोर दिया जा रहा है। सपा के जिलाध्यक्ष दीपराज गुर्जर का दावा है कि पार्टी का संगठन पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। उनका कहना है कि 2027 में सपा जालौन की तीनों विधानसभा सीटों पर जीत के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरेगी। लोकसभा चुनाव में उरई क्षेत्र से मिली बढ़त ने पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह भी बढ़ाया है।

जातीय समीकरण

उरई सुरक्षित सीट होने के कारण यहां अनुसूचित जाति के मतदाताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक क्षेत्र में करीब 1.29 लाख ओबीसी, 1.15 लाख अनुसूचित जाति, 54,700 सवर्ण और करीब 44 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। इसके अलावा अन्य वर्गों के मतदाता भी चुनावी गणित का हिस्सा हैं। यही वजह है कि भाजपा और विपक्ष दोनों की नजर अलग-अलग सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने पर रहेगी। खासकर दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का रुख चुनाव परिणाम पर निर्णायक असर डाल सकता है।

एंटी-इनकंबेंसी की चुनौती

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी रुझान हो सकता है। गौरी शंकर वर्मा लगातार दो बार से विधायक हैं और ऐसे में विपक्ष स्थानीय स्तर पर उनके कार्यकाल को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा। प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों का असर भी चुनाव पर पड़ सकता है। विपक्ष सरकार के खिलाफ नाराजगी को स्थानीय चुनावी समीकरण से जोड़ने की कोशिश करेगा। हालांकि भाजपा का पक्ष यह है कि विकास और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे जनता तक पहुंचा है और यही चुनाव में उसकी सबसे बड़ी ताकत होगी।

कांग्रेस और बसपा

उरई की लड़ाई केवल भाजपा और सपा तक सीमित रहेगी या इसमें कांग्रेस कोई नया समीकरण बनाएगी, यह भी 2027 में महत्वपूर्ण होगा। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अगर विपक्षी दलों के बीच व्यापक गठबंधन बनता है, तो कांग्रेस के पास भी यहां मुकाबला मजबूत करने का मौका हो सकता है। पूर्व सांसद बृजलाल खाबरी जैसे नेताओं की मौजूदगी को पार्टी के लिए अहम माना जा रहा है। वहीं, बसपा का प्रभाव पहले की तुलना में कमजोर हुआ है। ऐसे में उसका पारंपरिक वोट किस दिशा में जाता है, यह भी भाजपा और विपक्ष के बीच मुकाबले को प्रभावित कर सकता है।

साफ होगी असली तस्वीर

फिलहाल उरई विधानसभा सीट पर भाजपा अपनी लगातार तीसरी जीत के लिए मैदान तैयार कर रही है, जबकि सपा 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त को विधानसभा चुनाव की जीत में बदलने की कोशिश करेगी। जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे, विधायक के काम का आकलन, सरकार के प्रति जनता की राय और विपक्षी दलों के बीच संभावित गठबंधन—ये सभी फैक्टर चुनाव में महत्वपूर्ण होंगे।

हालांकि अभी 2027 के विधानसभा चुनाव में समय है और प्रमुख दलों ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है। इसलिए फिलहाल किसी एक दल की जीत तय मानना जल्दबाजी होगी। प्रत्याशियों के नाम और चुनावी गठबंधन सामने आने के बाद उरई की सियासी तस्वीर काफी हद तक साफ होगी। लेकिन इतना जरूर है कि 2027 में उरई सुरक्षित सीट पर भाजपा और विपक्ष के बीच मुकाबला पिछले चुनावों के मुकाबले ज्यादा दिलचस्प रहने की संभावना है।

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