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Success Story: टपकती छत, दीये की रोशनी और पिता का संघर्ष… अब कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीतकर बेटी ने रचा इतिहास

Success Story : “मेरा बचपन बहुत संघर्षों में बीता। बरसात में घर की छत टपकती थी, दीये की रोशनी में पढ़ाई करती थी। पापा रोज 12 किलोमीटर स्कूटर से मुझे जूडो सिखाने ले जाते थे।” यह शब्द हैं कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मेडल जीतने वाली और उत्तर प्रदेश पुलिस में महिला दरोगा अस्मिता डे के, जिनकी सफलता की कहानी आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

23 वर्षीय अस्मिता डे का जन्म त्रिपुरा के दक्षिण जिले के सुनाई छेरी गांव में हुआ। परिवार का घर कच्चा था, जिसमें सिर्फ दो छोटे कमरे थे। बारिश होते ही छत टपकने लगती और पानी घर के अंदर तक भर जाता था। गांव में बिजली नहीं थी, इसलिए पढ़ाई दीये और लालटेन की रोशनी में करनी पड़ती थी।

Success Story

अस्मिता के पिता अर्जुन कुमार डे साइकिल मिस्त्री थे। सीमित आय के बावजूद उन्होंने बेटी के सपनों से कभी समझौता नहीं किया। जब अस्मिता सातवीं कक्षा में थीं, तब गांव से 12 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय में जूडो सीखने जाती थीं। पिता रोज पुराने स्कूटर से उन्हें प्रशिक्षण केंद्र छोड़ते, फिर दुकान पर काम करते और दोपहर में वापस लेकर आते थे। कुछ समय बाद बेहतर प्रशिक्षण के लिए अस्मिता अपने ताऊ के घर चली गईं, जो उनके गांव से करीब 100 किलोमीटर दूर था। वहां रहकर उन्होंने जूडो की तैयारी जारी रखी और अपने खेल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

पिता का सपना था पक्का घर

अस्मिता बताती हैं कि पिता का सपना था परिवार के लिए सीमेंट का पक्का घर बनाना। बड़ी बहन की शादी और आर्थिक तंगी के कारण यह सपना अधूरा रह गया। सरकारी सहायता से घर का एक हिस्सा पक्का जरूर बना, लेकिन पूरा मकान बनने से पहले ही पिता का निधन हो गया। साल 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने अस्मिता डे को पुलिस विभाग में कॉन्स्टेबल की नौकरी दी। बाद में वह महिला दरोगा बनीं। नौकरी मिलने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरी और पिता के इलाज व अन्य जरूरतों के लिए लिया गया कर्ज भी चुकाया गया।

आशीर्वाद लेकर जीता गोल्ड

कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता में उतरने से पहले अस्मिता की मां ने वीडियो कॉल पर उन्हें पिता की समाधि दिखाई और कहा, “आशीर्वाद लो, गोल्ड जरूर जीतोगी।” अस्मिता ने उस आशीर्वाद को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर पिता का सपना और परिवार का संघर्ष दोनों सार्थक कर दिए। यह कहानी बताती है कि संसाधनों की कमी सफलता की राह नहीं रोकती, यदि हौसला, परिवार का साथ और लक्ष्य के प्रति समर्पण मजबूत हो।

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