UP Politics : उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ती राजनीति में अब लड़ाई केवल विकास योजनाओं, जातीय समीकरणों और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इतिहास, विरासत और अलग-अलग समुदायों के महापुरुष भी सियासी विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पिछले वर्षों में महाराजा सुहेलदेव, ऊदा देवी पासी, निषादराज, महाराजा बिजली पासी और संत रविदास जैसे नामों को सरकारी कार्यक्रमों, स्मारकों और संस्थानों से जोड़ने पर जोर दिया है। बीजेपी इसे लंबे समय तक उपेक्षित रहे महापुरुषों को सम्मान और सांस्कृतिक पहचान वापस दिलाने की कोशिश बताती है।
ऐसे फैसलों के राजनीतिक मायने भी निकाले जाते रहे हैं, क्योंकि इनमें राजभर, निषाद, पासी और दूसरे दलित-पिछड़े समुदायों से जुड़े कई ऐतिहासिक चेहरे शामिल हैं। 2027 से पहले जब अखिलेश यादव पीडीए की रणनीति पर जोर दे रहे हैं, तब योगी सरकार की विरासत से जुड़ी यह राजनीति भी चर्चा के केंद्र में है।
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इस अभियान का बड़ा चेहरा महाराजा सुहेलदेव हैं। जून 2025 में योगी आदित्यनाथ ने बहराइच की चित्तौरा झील के पास तैयार महाराजा सुहेलदेव स्मारक का उद्घाटन और उनकी प्रतिमा का अनावरण किया था। स्मारक की आधारशिला 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रखी थी। बहराइच का मेडिकल कॉलेज और आजमगढ़ का राज्य विश्वविद्यालय भी महाराजा सुहेलदेव के नाम से जुड़े हैं। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना ऊदा देवी पासी की स्मृति को भी सरकार ने प्रमुखता दी है। लखनऊ में उनकी प्रतिमा और बलिदान दिवस से जुड़े कार्यक्रमों के साथ उनका नाम सरकारी स्तर पर सामने लाया गया।
महिला पीएसी बटालियनों को ऊदा देवी, झलकारी बाई और अवंती बाई लोधी जैसे ऐतिहासिक चेहरों से जोड़ने की पहल को भी अलग-अलग समुदायों की वीरांगनाओं को संस्थागत पहचान देने की कोशिश के रूप में पेश किया गया।
बिजली पासी तक बढ़ा दायरा
योगी सरकार ने निषादराज की सांस्कृतिक विरासत को भी सार्वजनिक कार्यक्रमों से जोड़ा है। रामायण परंपरा में निषादराज गुह और भगवान राम के संबंध को सामाजिक समरसता के उदाहरण के तौर पर सामने रखा जाता रहा है। वहीं महाराजा बिजली पासी से जुड़े स्थलों के विकास और उनकी स्मृति को आगे बढ़ाने की योजनाएं भी सरकार के एजेंडे में शामिल रही हैं। विरासत की इस राजनीति का दूसरा हिस्सा धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों का विकास है। काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या के बाद नैमिषारण्य तथा श्रावस्ती जैसे क्षेत्रों में भी पर्यटन और धार्मिक बुनियादी ढांचे को विकसित करने पर जोर दिया गया। सरकार इसे आस्था को विकास और रोजगार से जोड़ने की रणनीति के तौर पर पेश करती रही है।
फैसलों ने भी खींचा ध्यान
योगी सरकार के दौरान स्थानों और संस्थानों के नाम बदलने का मुद्दा भी लगातार चर्चा में रहा है। इलाहाबाद का नाम प्रयागराज और फैजाबाद जिले का अयोध्या किया गया। जुलाई 2026 में मुख्यमंत्री ने भदोही को दोबारा संत रविदास नगर नाम देने की घोषणा की। यह नाम मायावती सरकार के दौरान रखा गया था, जिसे बाद में अखिलेश यादव सरकार ने बदल दिया था। इन फैसलों को बीजेपी सांस्कृतिक विरासत और महापुरुषों के सम्मान से जोड़ती है, जबकि राजनीतिक विश्लेषण में इनके सामाजिक समीकरण भी देखे जाते हैं।
सुहेलदेव से राजभर समाज, निषादराज से निषाद समुदाय और ऊदा देवी व बिजली पासी से पासी समाज की ऐतिहासिक पहचान जुड़ी है। इसलिए 2027 के चुनावी माहौल में इन पहलों के राजनीतिक प्रभाव पर भी बहस होना तय है।
विरासत की राजनीति पर नजर
अखिलेश यादव जहां पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के जरिए सामाजिक गठजोड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं बीजेपी विकास और कल्याणकारी योजनाओं के साथ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान को भी अपने राजनीतिक संवाद में जगह दे रही है। ऐसे में 2027 की लड़ाई में सवाल केवल किस पार्टी ने क्या काम किया, इतना नहीं रहेगा। किसने किन समुदायों के नायकों, इतिहास और पहचान को कितना सम्मान दिया, यह भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकता है।
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