Saint Ravidas Jayanti : संत शिरोमणि रविदास की 650वीं प्रकाश जयंती के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी से भाजपा ने एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक अभियान की शुरुआत की है। सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास की जन्मस्थली से आरंभ हुए इस सात महीने लंबे समरसता संकल्प अभियान को केवल धार्मिक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि ओबीसी और दलित समाज के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने की एक बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
इस पूरे कार्यक्रम की शुरुआत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और केंद्रीय राज्यमंत्री पंकज चौधरी की मौजूदगी में हुई। यह अभियान फरवरी 2027 में जाकर समाप्त होगा।
Saint Ravidas
राजनीतिक नजरिए से यह समयावधि काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि इसी दौरान पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी जोर पकड़ेंगी और साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़ी सियासी हलचलें भी तेज होंगी। कार्यक्रम के मंच से भाजपा ने अपने सामाजिक समीकरणों को लेकर स्पष्ट संकेत दिए। इस आयोजन में मौजूद ज्यादातर बड़े नेता ओबीसी और दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले चेहरे रहे। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और दिल्ली से पहुंचे नेताओं के साथ-साथ कई केंद्रीय स्तर के दलित नेताओं ने भी इस अभियान में हिस्सा लिया।
100 संतों की मौजूदगी
इस मौके पर रैदास समाज से जुड़े करीब 100 संतों की उपस्थिति ने आयोजन की सामाजिक अहमियत को और बढ़ा दिया। गौरतलब है कि भाजपा लंबे समय से डॉ. भीमराव अंबेडकर, संत रविदास, महर्षि वाल्मीकि जैसे दलित संतों और महापुरुषों की विरासत को अपने राजनीतिक विमर्श से जोड़ती रही है। इस अभियान के जरिए संत रविदास के समता, सामाजिक न्याय और भेदभाव मुक्त समाज से जुड़े विचारों को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
गांव-गांव तक पहुंचेगा अभियान
इस पूरे अभियान के तहत कलश यात्रा, संत संपर्क कार्यक्रम, समरसता यात्राएं, छात्रावास संपर्क अभियान और बूथ स्तर तक पहुंच बनाने की विस्तृत योजना तैयार की गई है। इसका मकसद संत रविदास के विचारों को गांव-गांव तक पहुंचाना है, साथ ही समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संवाद को मजबूत करना भी है। इस पूरे अभियान में पंजाब की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राज्य के दोआबा क्षेत्र में रविदासिया समाज का सामाजिक प्रभाव काफी मजबूत है, और कई विधानसभा क्षेत्रों में यह समुदाय चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहता है।
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