S. Jaishankar : विदेश मंत्री एस जयशंकर सोमवार को तीन दिवसीय अमेरिका दौरे पर रवाना हुए। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में ठहराव और तनाव की चर्चा लगातार हो रही है। जयशंकर का यह दौरा केवल औपचारिक नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच आई दूरी को कम करने की एक गंभीर कूटनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है।
वॉशिंगटन में जयशंकर उस मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में हिस्सा लेंगे, जिसका फोकस महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला पर है। यह सम्मेलन अमेरिका की अगुवाई में आयोजित किया जा रहा है, जहां स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और रणनीतिक खनिजों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर चर्चा होगी।
S. Jaishankar अमेरिका दौरा
भारत के लिए यह मंच इसलिए भी अहम है, क्योंकि भविष्य की ऊर्जा और तकनीक इन्हीं खनिजों पर निर्भर मानी जा रही है। दौरे के दौरान जयशंकर की अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात संभावित मानी जा रही है। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी बातचीत की उम्मीद है। इन बैठकों में व्यापार, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो सकती है।
2 से 5 फरवरी तक चलेगा दौरा
विदेश मंत्रालय के अनुसार, जयशंकर 2 से 5 फरवरी तक अमेरिका में रहेंगे। इस दौरान केवल सम्मेलन ही नहीं, बल्कि कई बंद कमरे की बैठकों का भी एजेंडा तय है। माना जा रहा है कि इन चर्चाओं में भविष्य की रणनीति और आपसी मतभेदों को सुलझाने पर जोर रहेगा। पिछले कुछ समय से भारत-अमेरिका संबंधों में खटास साफ दिखाई दी है। रूसी कच्चे तेल की भारत द्वारा खरीद को लेकर अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया, जिससे टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस फैसले ने व्यापारिक रिश्तों को झटका दिया और दोनों देशों के बीच असहजता बढ़ी।
अन्य मुद्दों ने भी बढ़ाया तनाव
टैरिफ के अलावा भी कई ऐसे मुद्दे रहे, जिन्होंने रिश्तों में तल्खी पैदा की। भारत-पाकिस्तान से जुड़े एक बयान को लेकर विवाद, वाशिंगटन की नई आव्रजन नीति और वैश्विक मंचों पर अलग-अलग रुख इन सबने हालात को और जटिल बनाया। जयशंकर की यह यात्रा इसी पृष्ठभूमि में बेहद अहम मानी जा रही है। माना जा रहा है कि भारत इस दौरे के जरिए अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि मतभेदों के बावजूद साझेदारी दोनों देशों के हित में है।
भारत और अमेरिका की साझेदारी व्यापार सहित रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक रणनीति से भी जुड़ी है। ऐसे में जयशंकर का यह दौरा आने वाले वर्षों की दिशा तय कर सकता है। अगर दोनों पक्ष खुले मन से बातचीत करते हैं, तो टैरिफ और नीति से जुड़े विवादों का हल निकल सकता है।
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