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Sunil Gavaskar ने अंपायर को सख्ती बरतने की दी सलाह, हथेलियों पर टेप लगाने की भी की आलोचना

Sunil Gavaskar
Sunil Gavaskar

Sunil Gavaskar : रॉड लेवर एरिना में घड़ी की सुइयां जब आधी रात पार कर चुकी थीं, तब टेनिस सिर्फ एक खेल नहीं रहा। हर रैली, हर सांस और हर कदम इतिहास का हिस्सा बनता जा रहा था। जानिक सिनर का एक बैकहैंड जब ट्रामलाइन के बाहर गया, उसी पल नोवाक जोकोविच ने यह जता दिया कि उम्र, थकान और समय तीनों महान खिलाड़ियों के सामने बौने साबित होते हैं। यह जीत सिर्फ फाइनल का टिकट नहीं थी, बल्कि जिद, धैर्य और मानसिक ताकत का प्रमाण थी।

इस जीत के साथ जोकोविच अब अपने करियर के 25वें ग्रैंड स्लैम खिताब से महज एक कदम दूर हैं। फाइनल में उनका सामना कार्लोस अलकराज से होगा… वही खिलाड़ी जिसने उन्हें विंबलडन में सीधे सेटों में हराया था।

Sunil Gavaskar ने दी सलाह

सवाल साफ है, क्या इतनी लंबी और थकाने वाली जंग के बाद जोकोविच के भीतर एक और महायुद्ध जीतने की ताकत बची है? लेकिन इतिहास गवाह है, जब जोकोविच पर शक किया गया, उन्होंने जवाब रैकेट से दिया। सिनर और अलकराज इस दौर के सबसे खतरनाक खिलाड़ी माने जाते हैं। उनके खिलाफ जीत साधारण खेल से नहीं मिलती। सेमीफाइनल में हर पॉइंट के लिए जोकोविच का संघर्ष दिखाता है कि महानता तकनीक से ज्यादा मानसिक मजबूती में छिपी होती है। यही वजह रही कि खेल जगत के दिग्गज भी रात दो बजे तक स्क्रीन से नजरें हटाने को तैयार नहीं थे। यह मुकाबला समय का मोहताज नहीं था, यह जज्बे का खेल था।

टेनिस से क्रिकेट तक सीख

यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या दूसरे खेल, खासकर क्रिकेट, ऐसी सहनशक्ति से कुछ सीख सकते हैं? क्रिकेट में हल्की बूंदाबांदी पर खेल रोक दिया जाता है, लेकिन खेल के दौरान वही बूंदें गिरें तो मैच चलता रहता है। आउटफील्ड गीली होने का तर्क भी अक्सर दिया जाता है, जबकि डे-नाइट मैचों में ओस से मैदान पूरी तरह भीगा रहता है और फिर भी खेल जारी रहता है।

क्रिकेट को सहनशक्ति का खेल कहा जाता है, लेकिन मैदान पर सुविधाओं की भरमार इसे धीरे-धीरे आरामतलब बना रही है। हर ओवर के बाद पानी, स्टैमिना ड्रिंक, हल्की मालिश ये सब कब नियम बन गए, पता ही नहीं चला। बल्लेबाजों को यह सुविधा नहीं मिलती, फिर गेंदबाजों को क्यों? अगर एक बार नजरअंदाज किया गया, तो यही ढील भविष्य की आदत बन जाती है।

कही ये बात

आजकल फील्डरों की हथेलियों पर टेप आम हो गया है। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन पूरी हथेली ढकना खेल की आत्मा के खिलाफ है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो अगला कदम दस्ताने होंगे। जैसे बल्लों की जांच होती है, वैसे ही फील्डिंग उपकरणों पर भी नजर होनी चाहिए। खेल सख्त गेंद और सख्त खिलाड़ियों का है… इसे जरूरत से ज्यादा नरम मत बनाइए। यही जोकोविच की रात हमें याद दिलाती है।

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