MP News : मध्य प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण को मजबूती देने के उद्देश्य से चलाए जा रहे भारतीय गौर पुनर्स्थापना एवं ट्रांसलोकेशन कार्यक्रम के तहत एक और बड़ी सफलता मिली है। कार्यक्रम के तीसरे दिन, 25 जनवरी को सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से 1 नर और 5 मादा गौर को सुरक्षित रूप से बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया। इस पूरी प्रक्रिया को विशेषज्ञों की निगरानी में अंजाम दिया गया, ताकि गौरों को किसी भी तरह का खतरा न हो और वे नए वातावरण में आसानी से ढल सकें।
22 जनवरी से शुरू हुए इस महत्वाकांक्षी अभियान के तहत अब तक कुल 19 भारतीय गौरों को सतपुड़ा से बांधवगढ़ स्थानांतरित किया जा चुका है। वन विभाग के अनुसार, यह प्रक्रिया पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से की जा रही है ताकि गौरों की सेहत, सुरक्षा और अनुकूलन पर कोई असर न पड़े।
MP के बांधवगढ़ में लौट रही गौर
आने वाले दो से तीन दिनों में सतपुड़ा से 8 और गौर लाने की तैयारी भी चल रही है, जिससे बांधवगढ़ में गौरों की संख्या और अधिक मजबूत हो सकेगी। भारतीय गौर को हाथी के बाद सबसे बड़ा शाकाहारी वन्यप्राणी माना जाता है। यह केवल आकार में ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी अहम भूमिका के कारण भी बेहद महत्वपूर्ण है। गौर खुरदुरी और मोटी घास का सेवन करते हैं, जिसे छोटे शाकाहारी जीव जैसे हिरण और मृग नहीं खा पाते। इस वजह से जंगलों में घास का संतुलन बना रहता है और अन्य प्रजातियों को भी बेहतर आवास और भोजन मिलता है।
1998 में बांधवगढ़ से हो गए थे विलुप्त
कभी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व गौरों का प्रमुख प्राकृतिक आवास हुआ करता था। 1990 के दशक तक गौर आहार की तलाश में अमरकंटक के जंगलों तक मौसमी रूप से जाते थे। हालांकि, समय के साथ सड़क, रेलवे लाइन, बिजली की लाइनें और अन्य मानव गतिविधियों के कारण उनके प्राकृतिक कॉरिडोर बाधित हो गए। ऐसे में गौरों का आवागमन रुक गया और वर्ष 1998 तक बांधवगढ़ क्षेत्र से गौर पूरी तरह समाप्त हो गए।
2010 से दोबारा बसाने की कोशिश
गौरों के लुप्त होने के बाद मध्य प्रदेश वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान ने मिलकर वर्ष 2010-11 में बांधवगढ़ में गौर पुनर्स्थापना की योजना शुरू की। इस अभियान के तहत कान्हा टाइगर रिजर्व से 50 गौर लाकर यहां बसाए गए। अब आनुवंशिक विविधता बनाए रखने और प्रजाति को अधिक मजबूत बनाने के लिए सतपुड़ा से भी 50 गौर लाने की योजना पर काम किया जा रहा है, जिनमें से 22 गौर पिछले वर्ष फरवरी में ही लाए जा चुके थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रयास से जंगलों का पारिस्थितिकी संतुलन बेहतर होगा और आने वाले वर्षों में गौरों की एक स्थायी और मजबूत आबादी विकसित की जा सकेगी।
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