Agra Carpet Industry Crisis : मुगलकाल से दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाला आगरा का 450 साल पुराना हस्तनिर्मित कालीन उद्योग इन दिनों सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। युद्ध, महंगे कच्चे माल, बढ़ती शिपिंग लागत और विदेशी बाजारों से घटते ऑर्डर ने इस पारंपरिक उद्योग की रफ्तार थाम दी है। हालत यह है कि छह वर्षों में उद्योग से जुड़े कारीगरों की संख्या करीब 45 हजार से घटकर सिर्फ 25 हजार रह गई है, जबकि कई इकाइयों पर काम लगभग बंद हो चुका है।
कालीन निर्यातकों के मुताबिक पहले रूस-यूक्रेन युद्ध, फिर अमेरिकी टैरिफ और उसके बाद ईरान से जुड़े हालात का सीधा असर उद्योग पर पड़ा। कच्चा माल लगातार महंगा हुआ, वहीं अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख बाजारों तक कालीन भेजने की शिपिंग लागत तीन से चार गुना तक बढ़ गई।
Agra Carpet Industry Crisis
बढ़ती लागत के कारण विदेशी खरीदार नए ऑर्डर देने से बच रहे हैं। आगरा में कालीन उद्योग का सालाना कारोबार एक हजार करोड़ रुपये से अधिक का माना जाता है। जिले में करीब छह हजार छोटी-बड़ी इकाइयां गांवों में कुटीर उद्योग के रूप में संचालित होती हैं। इन इकाइयों में आज धागा और कच्चा माल तो मौजूद है, लेकिन नए ऑर्डर नहीं होने से करघे शांत पड़े हैं। कई कारखाने बंद होने के कारण हजारों कारीगर रोजगार की तलाश में दूसरे काम करने को मजबूर हो गए हैं।
पीढ़ियों की विरासत
मुगल काल में ईरान से आगरा पहुंची कालीन बुनाई की कला को स्थानीय कारीगरों ने विश्वस्तरीय पहचान दिलाई। फतेहपुर सीकरी, फतेहाबाद, शमशाबाद, सैयां, बिचपुरी, किरावली, अछनेरा और मिढ़ाकुर जैसे इलाकों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह हुनर आगे बढ़ता रहा। कभी इस उद्योग से करीब 80 हजार कारीगर जुड़े थे। कोविड-19 के बाद यह संख्या घटकर 45 हजार रह गई और अब केवल 25 हजार कारीगर ही इस पेशे में सक्रिय हैं।
निर्यातकों का कहना है कि कम आमदनी और अनिश्चित भविष्य के कारण नई पीढ़ी इस पारंपरिक कला से दूरी बना रही है। पहले परिवारों में बच्चे अपने बुजुर्गों से कालीन बुनाई सीखते थे, लेकिन अब युवाओं का रुझान दूसरे रोजगारों की ओर बढ़ रहा है। इससे सदियों पुरानी यह कला धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।
सरकारी सहायता की उम्मीद
कालीन निर्यातक संतोष माहेश्वरी का कहना है कि यदि समय रहते सरकार ने उद्योग को राहत नहीं दी तो आगरा का पारंपरिक हस्तनिर्मित कालीन उद्योग गंभीर संकट में पड़ सकता है। वहीं निर्यातक राजेश जैन का मानना है कि मांग बढ़ाने, निर्यात को प्रोत्साहन देने और कारीगरों को आर्थिक सहयोग मिलने से ही इस विरासत को बचाया जा सकता है। उद्योग जगत का कहना है कि आगरा के हस्तनिर्मित कालीन आज भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी गुणवत्ता और बारीक कारीगरी के लिए खास पहचान रखते हैं, जरूरत केवल उन्हें फिर से प्रतिस्पर्धी बनाने की है।
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