US Voter Database : अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले ट्रम्प प्रशासन वोटर लिस्ट की जांच और मतदाता रिकॉर्ड को एक जगह जुटाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी इमिग्रेशन एजेंसी ICE (Immigration and Customs Enforcement) ने सभी 50 राज्यों से वोटर रजिस्ट्रेशन और चुनावी रिकॉर्ड जुटाकर एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने के लिए 50 लाख डॉलर तक के कॉन्ट्रैक्ट की योजना बनाई है।
इस कदम का मकसद प्रशासन के मुताबिक संभावित चुनावी गड़बड़ियों और अपात्र मतदाताओं की पहचान में मदद करना है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया को लेकर नागरिक अधिकार संगठनों और कई राज्य अधिकारियों ने निजता, गलत पहचान और पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंका जताई है।
US Voter Database
रिपोर्ट के मुताबिक ICE का प्रस्तावित डेटाबेस सभी 50 राज्यों के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वोटर रिकॉर्ड को एक जगह जुटाने पर केंद्रित है। इसमें मतदाता का रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड और चुनाव में मतदान से जुड़ी जानकारी शामिल हो सकती है। कुछ मामलों में पार्टी से जुड़ी जानकारी भी शामिल की जा सकती है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट अनुमति की जरूरत होगी। ICE ने पहले ही टेक्सास और नॉर्थ कैरोलिना के कुछ स्थानीय चुनाव अधिकारियों से वोटर फाइलें हासिल की हैं। अमेरिका की यह प्रक्रिया भारत के Special Intensive Revision (SIR) जैसी घर-घर जाकर मतदाता सत्यापन की कवायद नहीं है। अमेरिका में अलग-अलग राज्यों और स्थानीय प्रशासन के पास वोटर रजिस्ट्रेशन की जिम्मेदारी होती है।
ट्रम्प प्रशासन संघीय और राज्य स्तर के अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके मतदाता पात्रता की जांच को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए इमिग्रेशन और नागरिकता से जुड़े डेटाबेस का भी इस्तेमाल करने की कोशिश हुई है। हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर अदालतों में लगातार कानूनी लड़ाई चल रही है।
इस्तेमाल पर रोक
हालिया घटनाक्रम में अमेरिकी अपील अदालत ने ट्रम्प प्रशासन को DHS के SAVE डेटाबेस का इस्तेमाल करके वोटर रोल में नागरिकता की जांच करने से रोकने वाले निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने निजता और गलत पहचान से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंता जताई। फैसले में यह भी आशंका सामने आई कि डेटाबेस में मौजूद गलत या अधूरी जानकारी के कारण वैध मतदाताओं को भी अपने नागरिक होने का सबूत देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इससे ट्रम्प प्रशासन की देशभर में वोटर रिकॉर्ड की जांच को लेकर कानूनी विवाद और गहरा गया है।
दावा कितना सही?
अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के मतदाता हैं और न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया तथा टेक्सास जैसे राज्यों में उनका राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, करीब 26 लाख भारतवंशी वोटरों में से 10 लाख के नाम हटने का कोई पुष्ट आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे संभावित या तय संख्या के तौर पर पेश करना सही नहीं होगा। वास्तव में राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने की योजना का दायरा केवल भारतीय मूल के मतदाताओं तक सीमित नहीं है। इसका लक्ष्य देशभर के वोटर रिकॉर्ड को एकत्र करना है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रिपब्लिकन सांसद लंबे समय से संघीय चुनावों में वोट डालने के लिए सख्त पहचान और नागरिकता सत्यापन की वकालत करते रहे हैं।
इसी दिशा में SAVE America Act पेश किया गया है। इस प्रस्ताव में संघीय चुनावों के लिए वोटर रजिस्ट्रेशन के समय नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण और मतदान के समय फोटो ID अनिवार्य करने की बात कही गई है।
SAVE America Act अभी कानून नहीं
रिपब्लिकन नेताओं का तर्क है कि इससे केवल पात्र अमेरिकी नागरिकों को संघीय चुनावों में मतदान करने की अनुमति सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। वहीं डेमोक्रेटिक नेताओं और नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि इससे बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के लिए मतदान मुश्किल हो सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि SAVE America Act को कानून मानना सही नहीं होगा। यह एक प्रस्तावित कानून है, जिसकी सीनेट में स्थिति पर अभी राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है।
विधेयक के समर्थकों के मुताबिक इसमें नागरिकता प्रमाण और फोटो ID की व्यवस्था शामिल है। विरोधियों का कहना है कि दस्तावेजी शर्तों के कारण ऐसे पात्र मतदाता भी प्रभावित हो सकते हैं जिनके पास नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
चुनाव व्यवस्था भारत से अलग
भारत में चुनावों की निगरानी और संचालन के लिए भारत निर्वाचन आयोग एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था है। इसके विपरीत अमेरिका में चुनावों का प्रशासन मुख्य रूप से राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के जिम्मे होता है। इसी वजह से वोटर रजिस्ट्रेशन, मतदाता पहचान और वोटिंग प्रक्रिया के नियम राज्य-दर-राज्य अलग हो सकते हैं। ट्रम्प प्रशासन की कोशिश इसी विकेंद्रीकृत व्यवस्था में संघीय स्तर पर वोटर रिकॉर्ड तक अधिक पहुंच बनाने की दिशा में है। लेकिन राज्यों और संघीय सरकार के अधिकारों को लेकर यह प्रयास लगातार अदालतों में चुनौती झेल रहा है।
पहले भी विवाद
ट्रम्प प्रशासन की वोटर रोल जांच की कोशिशों को लेकर पहले भी कई राज्यों में विवाद हुआ है। संघीय सरकार ने राज्यों से विस्तृत मतदाता डेटा हासिल करने की कोशिश की, लेकिन कई मामलों में अदालतों ने इसे चुनौती देने वाले राज्यों या समूहों के पक्ष में फैसले दिए। रॉयटर्स के मुताबिक अगस्त तक ट्रम्प प्रशासन को राज्य के वोटर रोल तक पहुंच से जुड़े कई मामलों में लगातार अदालती झटके मिले थे। अदालतों ने चुनावों में राज्यों की संवैधानिक भूमिका और मतदाता डेटा की विश्वसनीयता से जुड़े सवाल उठाए। अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले वोटर रिकॉर्ड की जांच का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन गया है।
ट्रम्प प्रशासन इसे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पात्रता सुनिश्चित करने की कोशिश के तौर पर पेश कर रहा है, जबकि विरोधी दल और नागरिक अधिकार संगठन इसे संघीय हस्तक्षेप और संभावित मतदाता दमन से जोड़कर देख रहे हैं। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि राष्ट्रीय वोटर डेटाबेस बनाने की योजना किस सीमा तक लागू हो पाएगी और अदालतों में चल रहे मामलों का इसका क्या असर पड़ेगा।
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