UN Security Council Reform : दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी युद्ध और बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष और अफ्रीकी देशों में जारी हिंसा जैसी घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने वाली इस संस्था की सीमाओं को सामने ला दिया है। ऐसे समय में भारत सहित कई देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के ढांचे में बदलाव की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार संस्था को अधिक प्रभावी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की जरूरत है।
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान विश्व नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, संघर्ष और वैश्विक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। हालांकि इन चर्चाओं के बीच एक बड़ा सवाल यह भी बना हुआ है कि संयुक्त राष्ट्र अपने फैसलों को जमीन पर लागू कराने में कितना सक्षम है।
UN Security Council Reform
कई अंतरराष्ट्रीय विवादों में प्रमुख शक्तियों के बीच मतभेद होने के कारण सुरक्षा परिषद किसी साझा निर्णय तक नहीं पहुंच पाती। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना साल 1945 में दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य देशों के बीच विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाना और भविष्य में बड़े युद्धों को रोकना था। उस समय की वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा परिषद में अमेरिका, सोवियत संघ, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को स्थायी सदस्यता दी गई। सोवियत संघ के विघटन के बाद उसकी सीट रूस के पास आ गई। इन पांचों देशों को वीटो का विशेष अधिकार भी मिला, जिसके जरिए वे परिषद के महत्वपूर्ण प्रस्तावों को रोक सकते हैं।
बदलाव की मांग
करीब आठ दशक बाद दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या अब भी पांच है। यही वजह है कि भारत सहित कई देश इस व्यवस्था को वर्तमान समय के अनुरूप बदलने की वकालत कर रहे हैं। सुधार समर्थकों का तर्क है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने कहा कि यूक्रेन, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के संघर्षों जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र की निर्णयकारी भूमिका सीमित दिखाई दी है।
हालांकि, उन्होंने इस संस्था को समाप्त करने के बजाय इसमें सुधार करने की जरूरत पर जोर दिया। भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र जरूरी है, लेकिन इसकी कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना होगा।
5 देशों के पास वीटो का अधिकार
सुरक्षा परिषद के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में वीटो अधिकार भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में सभी सदस्य देशों को मतदान का अधिकार मिलता है, लेकिन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को वीटो के जरिए रोक सकते हैं। कई बार इन देशों के राजनीतिक और रणनीतिक हित अलग-अलग होने के कारण युद्धविराम या अन्य कार्रवाई से जुड़े प्रस्तावों पर सहमति नहीं बन पाती। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध इसका एक प्रमुख उदाहरण है। इसी तरह पश्चिम एशिया के संघर्षों और सूडान तथा म्यांमार की परिस्थितियों ने भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की क्षमता को लेकर बहस बढ़ाई है।
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र मानवीय सहायता, शरणार्थियों की मदद और कूटनीतिक बातचीत जैसे क्षेत्रों में काम करता रहा है, लेकिन सुरक्षा परिषद के भीतर मतभेद उसके कई प्रयासों को प्रभावित करते हैं।
गुटेरेस का कार्यकाल
इस बीच संयुक्त राष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो गई है। मौजूदा महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाला है। ऐसे में अगले महासचिव के चयन को लेकर सदस्य देशों के बीच चर्चा जारी है। संभावित दावेदारों में संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास की प्रमुख रेबेका ग्रिनस्पैन, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी और संयुक्त राष्ट्र में गुयाना की प्रतिनिधि कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट जैसे नाम चर्चा में हैं। अगले महासचिव के सामने संगठन की वित्तीय समस्याओं, सदस्य देशों के बीच बढ़ते मतभेदों और वैश्विक संकटों पर प्रभावी प्रतिक्रिया देने जैसी चुनौतियां होंगी। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र के प्रति सदस्य देशों का भरोसा मजबूत करना भी महत्वपूर्ण होगा।
भारत ने रखी मांग
भारत ने नए महासचिव की नियुक्ति प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा की भूमिका बढ़ाने की मांग की है। भारतीय सांसद सीपी जोशी ने महासभा में चर्चा के दौरान कहा कि महासचिव के चयन में भौगोलिक संतुलन और व्यापक प्रतिनिधित्व का ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने इस प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने के लिए अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करने की बात कही। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग भी करता रहा है। उसका तर्क है कि दुनिया की बड़ी आबादी, बढ़ती अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में योगदान को देखते हुए सुरक्षा परिषद में अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
सदस्य देशों की सहमति जरूरी
फिलहाल, संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर चर्चा जारी है, लेकिन किसी बड़े बदलाव के लिए सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति जरूरी होगी। विशेष रूप से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। आने वाले समय में नए महासचिव का चयन और सुरक्षा परिषद में सुधार की दिशा में होने वाली बातचीत से यह तय होगा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच संयुक्त राष्ट्र अपनी भूमिका को कितना मजबूत बना पाता है।
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