Plant for the Planet : दुनिया में बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा बड़े लोगों से नहीं होती। कई बार एक बच्चे का छोटा सा विचार भी लाखों लोगों को प्रेरित कर देता है। जर्मनी के फेलिक्स फिंकबाइनर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। महज 9 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल के एक प्रोजेक्ट के दौरान पेड़ लगाने का विचार रखा था। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह छोटा सा प्रयास आगे चलकर दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण की बड़ी मुहिम बन जाएगा। दरअसल, बात जनवरी 2007 की है। फेलिक्स जर्मनी में चौथी कक्षा के छात्र थे।
उन्हें स्कूल में जलवायु परिवर्तन पर प्रेजेंटेशन तैयार करने का काम मिला था। इसी विषय पर जानकारी जुटाते समय उन्होंने केन्या की पर्यावरण कार्यकर्ता वंगारी मथाई के बारे में पढ़ा। वंगारी मथाई के ग्रीन बेल्ट मूवमेंट ने महिलाओं की मदद से केन्या में करीब 3 करोड़ पेड़ लगाने का काम किया था।
Plant for the Planet
इस कहानी ने फेलिक्स को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने प्रेजेंटेशन के अंत में एक खास सुझाव दिया। उनका कहना था कि दुनिया के हर देश के बच्चों को मिलकर कम से कम 10 लाख पेड़ लगाने चाहिए। इसके बाद उन्होंने केवल सुझाव देकर बात खत्म नहीं की, बल्कि खुद इस दिशा में कदम भी उठाया। 28 मार्च 2007 को फेलिक्स ने अपने स्कूल के साथियों के साथ मिलकर स्कूल परिसर के पास पहला पेड़ लगाया। इसी के साथ ‘प्लांट-फॉर-द-प्लैनेट’ अभियान की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे दूसरे स्कूलों के बच्चे भी इस पहल से जुड़ने लगे।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के मुताबिक, स्कूल प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई इस मुहिम ने महज तीन साल में बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली। साल 2010 तक जर्मनी में इस अभियान के तहत 10 लाखवां पेड़ लगाया जा चुका था।
ठाना वैश्विक लक्ष्य
फेलिक्स की मुहिम केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रही। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा तक अपना संदेश पहुंचाया। उन्होंने दुनिया को समझाने की कोशिश की कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बच्चों और युवाओं की भागीदारी भी जरूरी है। उनका यह संदेश आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की पहल का हिस्सा बन गया। आज प्लांट-फॉर-द-प्लैनेट का लक्ष्य दुनिया भर में एक ट्रिलियन यानी 10 खरब पेड़ों को दोबारा उगाने और जंगलों की बहाली में मदद करना है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अकेला संगठन इतने पेड़ लगाएगा। यह एक वैश्विक लक्ष्य है, जिसमें अलग-अलग देशों, संस्थाओं और लोगों की भागीदारी जरूरी है।
संगठन से जुड़े आंकड़ें
संगठन से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, इसकी परियोजनाओं के तहत 3.6 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं। इसके अलावा, संगठन के प्लेटफॉर्म के माध्यम से करीब 11 करोड़ पेड़ों के लिए फंडिंग जुटाई गई है। मेक्सिको, घाना और स्पेन जैसे देशों में भी जंगलों की बहाली और पेड़ों के संरक्षण से जुड़े प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं। इस अभियान की एक दिलचस्प बात चॉकलेट से भी जुड़ी है। साल 2012 में ‘द चेंज चॉकलेट’ की शुरुआत की गई थी। इसके जरिए चॉकलेट की बिक्री से पेड़ लगाने के लिए आर्थिक मदद जुटाई जाती है। इस पहल से अब तक एक करोड़ से ज्यादा पेड़ों के लिए फंडिंग में सहायता मिलने का दावा किया गया है। इस तरह लोगों को रोजमर्रा की खरीदारी के जरिए भी पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की कोशिश की गई।
जलवायु परिवर्तन की समस्या
हालांकि पेड़ लगाने का काम केवल जमीन में पौधा लगाने तक सीमित नहीं है। किसी जंगल को दोबारा विकसित करने के लिए वहां की मिट्टी, पानी, स्थानीय पेड़-पौधों और प्राकृतिक परिस्थितियों को समझना जरूरी होता है। कई जगहों पर मिट्टी में मौजूद बीजों से पेड़ अपने आप उग सकते हैं, बशर्ते उनकी वृद्धि में आने वाली बाधाओं को दूर कर दिया जाए। वहीं, ज्यादा खराब हो चुकी जमीन पर नए पौधे लगाने की जरूरत पड़ती है। पर्यावरण विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि केवल पेड़ लगाकर जलवायु परिवर्तन की समस्या खत्म नहीं की जा सकती।
जीवाश्म ईंधन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना और पहले से मौजूद जंगलों को बचाना भी उतना ही जरूरी है। एक नए पौधे को बड़े पेड़ जितनी कार्बन संग्रह करने की क्षमता हासिल करने में कई दशक लग सकते हैं।
बदलाव की शुरुआत
फेलिक्स फिंकबाइनर की कहानी बताती है कि बदलाव की शुरुआत करने के लिए उम्र बड़ी होना जरूरी नहीं है। एक स्कूल प्रेजेंटेशन, दोस्तों के साथ लगाया गया पहला पेड़ और पर्यावरण को बचाने का विचार आज दुनिया भर के लोगों को प्रेरित कर रहा है। यह मुहिम इस बात की याद दिलाती है कि पौधा लगाना पहला कदम है, लेकिन उसे बड़ा करना और जंगलों को सुरक्षित रखना असली जिम्मेदारी है।
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