Kolkata CM Yogi Railly : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 22 अप्रैल को कोलकाता के जोड़ासांको इलाके में चुनावी रैली को संबोधित किया। रैली की शुरुआत से ही माहौल उत्तर भारत की राजनीति जैसा नजर आया, जहाँ समर्थक ‘जय श्रीराम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे लगा रहे थे। मंच पर पहुंचते ही बीजेपी उम्मीदवार विजय ओझा ने उनका स्वागत किया और पैर छूकर आशीर्वाद लिया। रैली स्थल पर बुलडोज़र की तस्वीरें लिए समर्थक भी दिखे, जो योगी की छवि को और मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे। अपने भाषण में योगी ने राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी पर तीखे हमले किए।
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में भाषा और धार्मिक पहचान के मुद्दों को गलत दिशा दी जा रही है। जैसे ही उन्होंने उर्दू और काली की धरती से जुड़े बयान दिए, भीड़ ने जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी।
Kolkata में CM योगी की रैली
हालांकि, इस रैली में बड़ी संख्या हिन्दी भाषियों की मौजूदगी रही, जिससे साफ संकेत मिलता है कि बीजेपी अपनी रणनीति में इस वर्ग को साधने पर खास ध्यान दे रही है। सवाल यह है कि इस तरह की राजनीति का असर बंगाल के स्थानीय, खासकर बांग्ला भाषी मतदाताओं पर कितना पड़ता है। रैली में शामिल बिप्लब डे जैसे कुछ लोगों ने सरकार के खिलाफ नाराजगी जरूर जताई, लेकिन उनका कहना था कि असली मुद्दे स्थानीय स्तर की समस्याएं हैं, न कि धार्मिक ध्रुवीकरण। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी के स्थानीय नेताओं की दखलअंदाजी से आम लोगों को परेशानी होती है और कारोबार करना मुश्किल हो गया है।
हिन्दुत्व बनाम बांग्ला अस्मिता
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी इस रणनीति को लेकर मतभेद है। वरिष्ठ पत्रकार सुमन भट्टाचार्य का मानना है कि योगी की आक्रामक शैली और भाषा बंगाल की सांस्कृतिक संवेदनशीलता से मेल नहीं खाती। उनके मुताबिक, इससे हिन्दी भाषी वोटरों को तो आकर्षण मिल सकता है, लेकिन बांग्ला भाषियों में दूरी बढ़ सकती है। वे मानते हैं कि बंगाल में केवल धार्मिक मुद्दों के सहारे राजनीति करना कारगर नहीं होगा। वहीं, पत्रकार दीप हलदर का नजरिया इससे अलग है। उनका कहना है कि कोलकाता और आसपास के इलाकों में गैर-बंगाली वोटरों की संख्या काफी है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
उनके अनुसार, बीजेपी की रणनीति इन्हीं इलाकों पर केंद्रित है और योगी की भाषा उसी हिसाब से चुनी गई है। वे यह भी कहते हैं कि राज्य में टीएमसी के खिलाफ नाराजगी एक बड़ा फैक्टर है, जो बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है।
लक्ष्मी भंडार का असर
दूसरी तरफ, टीएमसी नेताओं का दावा है कि इस तरह के बयान उनके पक्ष में माहौल बनाते हैं। उनका कहना है कि बंगाल की पहचान और संस्कृति को चुनौती देने वाली राजनीति को यहां के लोग स्वीकार नहीं करेंगे। साथ ही, राज्य सरकार की योजनाओं जैसे लक्ष्मी भंडार का असर भी जमीनी स्तर पर दिखाई देता है, जिससे लोगों का भरोसा बना हुआ है। पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय कई स्तरों पर बंटी हुई नजर आती है। एक ओर सत्ता विरोधी भावना है, तो दूसरी ओर विकल्प को लेकर संशय भी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी रैलियों की गूंज वोटों में कितनी तब्दील हो पाती है।
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