Nepal Flood Update : नेपाल में अगस्त के आखिर में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। इस आपदा में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत और हजारों लोगों के अब भी लापता होने की खबर है। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास कई इलाकों में बाढ़ का असर इतना भयावह रहा कि पूरे के पूरे गांव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे मलबे में तब्दील हो गए। नेपाल और चीन के बीच महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग माने जाने वाले ग्यिरोंग लैंड पोर्ट को भी बाढ़ से भारी नुकसान पहुंचा है।
हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से करीब 1,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस सीमा क्षेत्र में सड़कें और पुल मलबे में दब गए। राहत और बचाव दलों के पहुंचने के बाद यहां बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का भयावह मंजर सामने आया।
Nepal Flood
ग्यिरोंग लंबे समय से चीन के तिब्बत क्षेत्र और नेपाल के बीच व्यापार के प्रमुख रास्तों में शामिल रहा है। ऐसे में सीमा क्षेत्र में हुई तबाही का असर दोनों देशों के बीच सड़क मार्ग से होने वाले कारोबार पर भी पड़ सकता है। बाढ़ से चीन और नेपाल के बीच प्रस्तावित रेलवे कनेक्टिविटी को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। चीन ने 2016 में तिब्बत के रास्ते काठमांडू को जोड़ने वाली रेलवे परियोजना की योजना सामने रखी थी। बाद में इसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत ट्रांस-हिमालयन कनेक्टिविटी नेटवर्क का हिस्सा बनाया गया। प्रस्तावित रेल लाइन तिब्बत के शिगात्से से आगे ग्यिरोंग तक पहुंचने और फिर नेपाल के रसुवा जिले के रास्ते काठमांडू से जुड़ने की योजना पर आधारित है। नेपाल में प्रस्तावित रेल हिस्से की लंबाई करीब 72 किलोमीटर बताई जाती है।
आपदा ने बढ़ाई मुश्किल
26 अगस्त को उत्तरी नेपाल के लांगटांग क्षेत्र में ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से पानी और मलबे का तेज बहाव कई नदी प्रणालियों में पहुंचा। ल्हेन्डे खोला, भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों में अचानक बढ़े जलस्तर ने आसपास के इलाकों में भारी नुकसान पहुंचाया। बाढ़ और मलबे की चपेट में बस्तियों के अलावा सड़कें, पुल और पनबिजली से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी आया। इसका असर तिब्बत सीमा तक दिखाई दिया और ग्यिरोंग सीमा क्षेत्र भी प्रभावित हुआ। इस आपदा ने हिमालय जैसे भौगोलिक रूप से संवेदनशील इलाके में बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट तैयार करने की चुनौतियों को एक बार फिर सामने ला दिया है। इस क्षेत्र में भूस्खलन, बाढ़, भूकंप और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं का खतरा बना रहता है।
ऐसे में विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा तेज हुई है कि भविष्य की परियोजनाओं की योजना बनाते समय प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम का कितना आकलन किया गया है। खासकर संकरी पहाड़ी घाटियों में सड़क, रेल, सुरंग और पनबिजली परियोजनाओं के एक साथ विकसित होने से आपदा की स्थिति में नुकसान बढ़ने की आशंका रहती है।
रेलवे की व्यवहारिकता पर सवाल
नेपाल में प्रस्तावित चीन-नेपाल रेलवे परियोजना को लेकर बाढ़ से पहले भी सवाल उठते रहे हैं। नेपाल के पूर्व मंत्री मिनेंद्र रिजाल ने परियोजना की आर्थिक व्यवहारिकता पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि नेपाल इस रेलमार्ग के जरिए चीन को क्या निर्यात कर पाएगा और तिब्बत से कितना सामान आयात करेगा। उनका तर्क था कि नेपाल के लिए सड़क कनेक्टिविटी पर ज्यादा जोर देना व्यावहारिक हो सकता है। अब प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान के बाद हिमालयी इलाके में ऐसी महंगी और जटिल परियोजनाओं की व्यवहारिकता पर बहस फिर तेज हो सकती है। ग्यिरोंग को तिब्बत और नेपाल के बीच व्यापारिक संपर्क के महत्वपूर्ण मार्ग के रूप में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है।
2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद पुराने झांगमु-कोदारी मार्ग को भारी नुकसान हुआ था। इसके बाद चीन और नेपाल के बीच व्यापारिक आवाजाही के लिए ग्यिरोंग-रासुवागढ़ी मार्ग का महत्व और बढ़ गया। चीन ने 2014 में ग्यिरोंग क्रॉसिंग को अंतरराष्ट्रीय उपयोग के लिए औपचारिक रूप से खोला था। इसके बाद यह नेपाल और तिब्बत के बीच जमीनी व्यापार और संपर्क का अहम केंद्र बन गया।
BRI के लिए हिमालयी चुनौती
चीन-नेपाल रेलवे को 2018 में ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क के तहत BRI से जोड़ा गया था। योजना के अनुसार रेल नेटवर्क को तिब्बत के मौजूदा रेलवे नेटवर्क से आगे बढ़ाकर ग्यिरोंग होते हुए नेपाल और फिर काठमांडू तक पहुंचाना है। हालिया बाढ़ ने इस तरह की परियोजनाओं के सामने मौजूद प्राकृतिक जोखिमों को जरूर उजागर किया है। हालांकि, सिर्फ एक आपदा के आधार पर पूरी परियोजना की व्यवहारिकता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। आगे की योजना में प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु जोखिमों को किस तरह शामिल किया जाता है, यह इस परियोजना के भविष्य के लिए अहम होगा।
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