UP Politics : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बीच नेताओं की आवाजाही तेज होने लगी है। समाजवादी पार्टी के तीन बागी विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद कई विधानसभा सीटों पर नए समीकरण बनने की चर्चा है। खासकर अमेठी और अयोध्या की राजनीति में इस बदलाव का असर देखने को मिल सकता है। हालांकि, नए नेताओं के आने से भाजपा के सामने पुराने कार्यकर्ताओं और टिकट के दावेदारों को साथ रखने की चुनौती भी खड़ी हो सकती है।
अमेठी के गौरीगंज में आयोजित कार्यक्रम में सपा के बागी विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी भाजपा में शामिल हुए। प्रदेश नेतृत्व की मौजूदगी में हुए इस कार्यक्रम के बाद विधानसभा चुनाव में इन नेताओं की भूमिका को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पार्टी में शामिल होने का मतलब आगामी चुनाव के लिए टिकट तय होना नहीं है।
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राकेश प्रताप सिंह गौरीगंज और अभय सिंह गोसाईगंज विधानसभा क्षेत्र से जुड़े हैं। दोनों ठाकुर समुदाय से आते हैं। इन सीटों पर भाजपा के पुराने ब्राह्मण नेताओं की भी राजनीतिक दावेदारी रही है। ऐसे में नए नेताओं को चुनाव मैदान में उतारने की स्थिति में पार्टी को स्थानीय समीकरणों का ध्यान रखना होगा। गोसाईगंज में पूर्व विधायक खब्बू तिवारी का प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है। गौरीगंज के कार्यक्रम में भाजपा नेता चंद्रप्रकाश मिश्रा मटियारी नजर नहीं आए। वह पिछले विधानसभा चुनाव में राकेश प्रताप सिंह के खिलाफ भाजपा उम्मीदवार थे।
उनकी गैरमौजूदगी को नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, मटियारी का कहना है कि टिकट पर अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा और किसी नेता के भाजपा में शामिल होने से उसकी उम्मीदवारी तय नहीं हो जाती।
संजय सिंह भी कार्यक्रम से रहे दूर
अमेठी राजघराने से जुड़े वरिष्ठ नेता संजय सिंह भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। उनकी अनुपस्थिति को लेकर राजनीतिक चर्चाएं हैं, लेकिन इसके पीछे नाराजगी होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वहीं, मटियारी के दूसरे राजनीतिक विकल्प तलाशने और खब्बू तिवारी को किसी अन्य सीट से मौका मिलने की बातें भी फिलहाल अटकलों तक सीमित हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक कथित आदेश की चर्चा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दशरथ यादव बनाम सरकार मामले में दो न्यायाधीशों की पीठ ने तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया है।
साथ ही, प्रशासकों की नियुक्ति के खिलाफ याचिकाएं खारिज किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, आदेश की प्रमाणित प्रति और उसके सटीक निर्देशों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
चुनावी संतुलन की चुनौती
नए नेताओं के भाजपा में आने से पार्टी को कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक मजबूती मिलने की संभावना है। दूसरी ओर पुराने दावेदारों की उम्मीदों और स्थानीय जातिगत समीकरणों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। विधानसभा चुनाव से पहले टिकट वितरण को लेकर अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को ही करना है। वहीं, पंचायत चुनाव पर अदालत के आदेश की स्थिति स्पष्ट होने के बाद सरकार की अगली रणनीति भी सामने आएगी।
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