Pachmarhi Tourism : मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध हिल स्टेशन पचमढ़ी में पर्यटक झरने, पहाड़ और सतपुड़ा की खूबसूरत वादियां देखने पहुंचते हैं, लेकिन यहां की चट्टानों के भीतर छिपी कहानी कहीं ज्यादा पुरानी है। IISER भोपाल के वैज्ञानिकों की स्टडी में सामने आया है कि पचमढ़ी की कुछ ज्वालामुखीय चट्टानों का इतिहास करीब 6.6 करोड़ साल पुराना है। यानी ये उस दौर की भूवैज्ञानिक घटनाओं की गवाह हैं, जब धरती पर डायनासोर युग अपने अंतिम चरण में था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आज से करीब 6.6 करोड़ साल पहले पृथ्वी बड़े बदलावों से गुजर रही थी।
पश्चिम और मध्य भारत में विशाल स्तर पर ज्वालामुखीय गतिविधियां हुईं, जिन्हें डेक्कन ज्वालामुखीय गतिविधियों से जोड़ा जाता है। लगभग इसी समय क्रिटेशियस काल के अंत में हुए बड़े सामूहिक विलुप्तिकरण में गैर-पक्षी डायनासोर समेत पृथ्वी की कई प्रजातियां खत्म हो गई थीं।
Pachmarhi के खूबसूरत नजारे
पचमढ़ी में अध्ययन की गई चट्टानें प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधियों के दौरान निकले मैग्मा से बनी थीं। समय के साथ मैग्मा ठंडा होकर कठोर चट्टानों में बदल गया। इन्हीं पत्थरों के अध्ययन से वैज्ञानिकों को उस समय पृथ्वी के भीतर और उसके चुंबकीय क्षेत्र में हो रहे बदलावों को समझने के नए संकेत मिले हैं। इस रिसर्च की सबसे महत्वपूर्ण बात चट्टानों में मिली विपरीत चुंबकीय दिशाओं के प्रमाण हैं। ज्वालामुखीय चट्टानें ठंडी होते समय उस दौर के पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को अपने खनिजों में दर्ज कर सकती हैं। वैज्ञानिकों को पचमढ़ी के नमूनों में इसी प्राचीन भू-चुंबकीय गतिविधि के महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं।
भोपाल के वैज्ञानिकों ने की स्टडी
इस अध्ययन का नेतृत्व IISER भोपाल के प्रोफेसर ज्योतिर्मय मल्लिक ने किया है। रिसर्च में मुंबई स्थित भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान की गरिमा शुक्ला और बीवी लक्ष्मी भी शामिल रहीं। वैज्ञानिकों ने चट्टानों की चुंबकीय विशेषताओं का अध्ययन कर यह समझने की कोशिश की कि ये किस भूवैज्ञानिक समय से संबंधित हैं और उस दौरान पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र किस स्थिति में था। करीब 6.6 करोड़ साल पहले का समय वैज्ञानिकों के लिए इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दौर में पृथ्वी पर बड़े पैमाने पर जीवों का विलुप्तिकरण हुआ था।
डायनासोर के अंत के पीछे विशाल क्षुद्रग्रह के टकराने को प्रमुख कारण माना जाता है, जबकि उसी समय भारत में चल रही डेक्कन की तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियों और उनसे हुए पर्यावरणीय बदलावों की भूमिका पर भी लंबे समय से वैज्ञानिक अध्ययन होते रहे हैं।
जर्नल में प्रकाशित हुआ अध्ययन
पचमढ़ी की चट्टानों से जुड़ा यह अध्ययन भूविज्ञान से संबंधित जर्नल ‘Geochemistry, Geophysics, Geosystems’ में प्रकाशित हुआ है। रिसर्च से मध्य भारत के भूवैज्ञानिक इतिहास और प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधियों को समझने के लिए नई जानकारी मिलने की उम्मीद है। पचमढ़ी अब तक सतपुड़ा की पहाड़ियों, घने जंगलों, झरनों और प्राकृतिक नजारों के लिए पहचाना जाता रहा है। नई रिसर्च इसकी पहचान में भूवैज्ञानिक इतिहास का एक दिलचस्प पहलू जोड़ती है। यहां दिखाई देने वाली कुछ चट्टानें उस समय बनी थीं, जब आज के मध्य प्रदेश का भूगोल पूरी तरह अलग था और पृथ्वी पर बड़े प्राकृतिक बदलाव हो रहे थे। प्रोफेसर ज्योतिर्मय मल्लिक के मुताबिक ये चट्टानें उस प्राचीन पृथ्वी की याद दिलाती हैं, जो आज की दुनिया से काफी अलग थी।
इनमें ज्वालामुखीय गतिविधियों और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में हुए बदलावों का रिकॉर्ड छिपा है। ऐसे में अगली बार पचमढ़ी की पहाड़ियों के बीच किसी चट्टान को देखने पर वह सिर्फ एक साधारण पत्थर नहीं, बल्कि करोड़ों साल पुराने पृथ्वी के इतिहास का हिस्सा भी हो सकती है।
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