UP Politics : उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी लड़ाई जैसे-जैसे करीब आ रही है, बीजेपी संगठन की हर चाल पर नजर टिकती जा रही है। एक तरफ अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के समीकरण को गांव और बूथ तक पहुंचाने में जुटे हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी ने अपने उन पुराने संगठनात्मक चेहरों को फिर मैदान में उतार दिया है, जो 2014 से 2024 के बीच पार्टी के चुनावी अभियानों और संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। बीजेपी ने अपने 98 संगठनात्मक जिलों के लिए नए जिला प्रभारी घोषित किए हैं। सूची की सबसे दिलचस्प बात पुराने और अनुभवी नेताओं की बड़े पैमाने पर वापसी है।
जातीय और सामाजिक हिस्सेदारी को लेकर नई राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई है। सूची में ब्राह्मण और ओबीसी चेहरों की संख्या सबसे ज्यादा है, जबकि दलितों और महिलाओं की मौजूदगी काफी कम बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अनुभव पर लगाया गया बीजेपी का यह दांव अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले के सामने कितना असरदार साबित होगा।
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नई सूची में अनूप गुप्ता, कमलेश मिश्रा, संतोष सिंह, चंद्र मोहन, अशोक कटारिया, विजय बहादुर पाठक, सत्येंद्र सिसोदिया, मानवेंद्र सिंह, कौशलेंद्र पटेल, धर्मेंद्र सिंह और प्रांशु दत्त द्विवेदी जैसे अनुभवी नेताओं को जिम्मेदारी मिली है। इनमें कई नेता पहले प्रदेश मंत्री, महामंत्री, सचिव और अलग-अलग मोर्चों में महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं। नौ एमएलसी को भी जिलों की जिम्मेदारी दी गई है। सबसे ज्यादा चर्चा सूची के सामाजिक समीकरण की हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक 98 जिला प्रभारियों में 29 ब्राह्मण हैं। इसके बाद 25 ओबीसी और 18 ठाकुर नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है।
वैश्य समाज से 13 चेहरे शामिल हैं। इसके मुकाबले दलित नेताओं की संख्या पांच और महिलाओं की संख्या केवल चार बताई गई है। इसी अंतर ने बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग को लेकर राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी है।
दिखाई दिया खास जोर
नई टीम में करीब एक तिहाई जिम्मेदारी ब्राह्मण नेताओं को मिलने को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है। दूसरी तरफ ओबीसी को 25 जिलों की जिम्मेदारी देकर पार्टी ने इस बड़े वोट बैंक को भी प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। हालांकि दलित और महिला प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम होने के कारण विपक्ष को सवाल उठाने का मौका मिल सकता है। बीजेपी ने कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्रों में खास चेहरे उतारे हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे और प्रदेश उपाध्यक्ष नीरज सिंह को रायबरेली की जिम्मेदारी दी गई है। लखनऊ महानगर में त्रयम्बक त्रिपाठी, वाराणसी में अरुण पाठक, गाजियाबाद में अशोक कटारिया और नोएडा में डीके शर्मा को प्रभारी बनाया गया है।
अखिलेश का पीडीए बढ़ा रहा मुकाबले की धार
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी 2027 के लिए सामाजिक समीकरणों पर लगातार काम कर रही है। अखिलेश यादव पीडीए की रणनीति के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सपा ने गांवों में पीडीए पंचायतों के साथ बूथ स्तर पर भी संगठन मजबूत करने की कवायद तेज की है। ऐसे में बीजेपी की नई सूची के सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर चुनाव तक राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना है। जिला प्रभारी संगठन में बेहद महत्वपूर्ण कड़ी माने जाते हैं। वे जिले में पार्टी की गतिविधियों, पदाधिकारियों और चुनावी तैयारियों पर नजर रखते हैं।
बीजेपी की नई सूची संकेत देती है कि पार्टी ने इस स्तर पर नए प्रयोग से ज्यादा अनुभवी संगठनकर्ताओं पर भरोसा किया है। अब 2027 में यह रणनीति कितनी कारगर रहती है और पीडीए की काट में सामाजिक संतुलन का सवाल कितना असर डालता है, इसका जवाब चुनावी मैदान में मिलेगा।




