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Jagannath Rath Yatra 2026: हर साल नए बनते हैं भगवान जगन्नाथ के रथ, यात्रा के बाद लाखों में बिकता है एक पहिया, जानिए पूरी परंपरा

Jagannath Rath Yatra 2026 : पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा आज पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली जा रही है। भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अलग-अलग भव्य रथों में सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर माना जाता है, जहां तीनों देवता सात दिनों तक विराजमान रहते हैं। इसके बाद 24 जुलाई को बहुड़ा यात्रा के जरिए मुख्य मंदिर वापसी होगी और 27 जुलाई को विधि-विधान के साथ पुनः गर्भगृह में प्रवेश कराया जाएगा।

जगन्नाथ रथयात्रा की सबसे खास बात यह है कि तीनों रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं। इनके निर्माण के लिए ओडिशा वन विभाग मंदिर प्रशासन को 13 प्रजातियों की विशेष लकड़ियां उपलब्ध कराता है। फासी, धौरा, साल, आसन, गम्भारी, कदंब और सिमिली जैसी लकड़ियों का उपयोग पारंपरिक नियमों के अनुसार किया जाता है।

Jagannath Rath Yatra 2026

भविष्य में लकड़ी की कमी न हो, इसके लिए राज्य सरकार विशेष वृक्षारोपण कार्यक्रम भी संचालित कर रही है। रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होता है। इससे पहले वसंत पंचमी पर लकड़ियों की पूजा और रामनवमी पर पहली चिराई की परंपरा निभाई जाती है। रथ तैयार करने वाले कारीगर किसी आधुनिक इंजीनियरिंग ड्राइंग का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विशेष माप प्रणाली, लकड़ी की छड़ी और रस्सियों की मदद से पूरा ढांचा तैयार करते हैं। निर्माण पूरा होने के बाद सरकारी इंजीनियर रथों की तकनीकी जांच करते हैं और सुरक्षा प्रमाणन मिलने के बाद ही इन्हें यात्रा के लिए तैयार माना जाता है।

परंपरा रहती है आकर्षण

रथयात्रा के दिन सबसे पहले भगवान सुदर्शन, फिर बलभद्र, सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ को विशेष ‘पहांडी’ परंपरा के तहत झुलाते हुए रथों तक लाया जाता है। इसके बाद पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं और सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं। इस अनुष्ठान को ‘छेरा पहरा’ कहा जाता है, जो सेवा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

लाखों में बिकते हैं रथ के हिस्से

बहुड़ा यात्रा और सभी धार्मिक अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद मंदिर प्रशासन रथों को खोलने की प्रक्रिया शुरू करता है। सबसे पहले घोड़े, सारथी और सजावटी प्रतिमाएं सुरक्षित रखी जाती हैं। इसके बाद पहिए और अन्य विशेष लकड़ी के हिस्सों को अलग किया जाता है। मंदिर प्रशासन इन हिस्सों की नीलामी भी करता है। पिछले वर्ष भगवान जगन्नाथ के रथ के एक पहिए की शुरुआती कीमत तीन लाख रुपये, बलभद्र के रथ के पहिए की दो लाख रुपये और सुभद्रा के रथ के पहिए की डेढ़ लाख रुपये निर्धारित की गई थी। यही वजह है कि जगन्नाथ रथयात्रा केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत का भी अद्भुत संगम मानी जाती है।

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