Kumaraganj Agriculture University Controversy : आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज में शिक्षकों के दिल्ली में आयोजित कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का मामला अब नया मोड़ ले चुका है। क्रॉप फिजियोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष के बयान के बाद पूरे प्रकरण पर प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। विभागाध्यक्ष के अनुसार, सहायक प्राध्यापक डॉ. आलोक सिंह का एक दिवसीय टूर पूर्व कुलपति द्वारा पहले ही स्वीकृत किया जा चुका था।
उनके मुताबिक, डॉ. सिंह ने आधिकारिक अनुमति के तहत ही दिल्ली में आयोजित कॉन्फ्रेंस में भाग लिया। विश्वविद्यालय लौटने के बाद उन्होंने उपस्थिति पंजिका में ‘टी’ अंकित किया, जो टूर पर होने का संकेत माना जाता है। इस आधार पर एक शिक्षक के मामले में किसी अनियमितता से इनकार किया जा रहा है।
Kumaraganj Agriculture University Controversy
विवाद यहीं खत्म नहीं होता। सोशल मीडिया पर वायरल एक तस्वीर में डॉ. आलोक सिंह के साथ कई अन्य शिक्षक डॉ. समीर सिंह, डॉ. रवि कमल शर्मा, डॉ. महेंद्र सिंह, डॉ. विनोद दुबे और डॉ. शशांक कॉन्फ्रेंस में मौजूद दिखाई दे रहे हैं। इनमें से कई शिक्षक अलग-अलग कृषि महाविद्यालयों में तैनात हैं, लेकिन लंबे समय से विश्वविद्यालय मुख्यालय से संबद्ध होकर काम कर रहे हैं। इसी कारण उनकी उपस्थिति की वैधता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पूरा मामला अब इस बिंदु पर केंद्रित हो गया है कि यदि केवल एक शिक्षक का टूर स्वीकृत था, तो बाकी शिक्षकों ने उसी कार्यक्रम में किस आधार पर भाग लिया। विश्वविद्यालय परिसर में यह चर्चा भी तेज है कि क्या इन शिक्षकों ने आकस्मिक अवकाश लेकर यात्रा की थी, और यदि हां, तो क्या इसकी सूचना और अनुमति नियमानुसार दी गई थी।
प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल
इस प्रकरण ने विश्वविद्यालय की अवकाश व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्मचारियों के बीच यह चर्चा है कि बिना स्पष्ट स्वीकृति के इतने शिक्षकों का एक साथ कॉन्फ्रेंस में शामिल होना नियमों के पालन पर गंभीर प्रश्न उठाता है। मामला सामने आने के बाद कुलपति डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने जांच और आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया था। हालांकि अब तक किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई न होने से स्थिति और अधिक चर्चा में बनी हुई है।
छात्रों और कर्मचारियों में असंतोष
विश्वविद्यालय के भीतर इस मामले को लेकर असंतोष भी देखने को मिल रहा है। कर्मचारियों और छात्रों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण मामले में अभी तक कोई स्पष्ट निर्णय या कार्रवाई सामने नहीं आई है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल, विभागीय सफाई और प्रशासनिक चुप्पी के बीच यह मामला और उलझता दिखाई दे रहा है। अब सभी की निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन की आगामी जांच रिपोर्ट और संभावित कार्रवाई पर टिकी हैं, जो इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।
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