Pahalgam Attack : 22 अप्रैल 2025 को बैसरन घाटी में जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर दिया था। हंसते-खेलते परिवारों की खुशियां पलभर में मातम में बदल गईं। आतंकियों ने मासूम बच्चों और महिलाओं के सामने उनके अपने लोगों को धर्म पूछकर गोली मार दी। यह घटना सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं थी, बल्कि इंसानियत पर गहरा वार था, जिसकी टीस आज भी महसूस की जाती है। इस हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए कड़ा जवाब दिया।
22 निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया गया, लेकिन जिन परिवारों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए यह न्याय भी अधूरा ही महसूस होता है। वक्त गुजर गया, लेकिन उस दिन की यादें अब भी लोगों को अंदर तक हिला देती हैं।
Pahalgam Attack की पहली बरसी
कानपुर के शुभम द्विवेदी का परिवार आज भी गहरे सदमे में है। शादी के कुछ ही दिनों बाद उनकी जिंदगी उजड़ गई। उनकी पत्नी एशान्या के हाथों की मेंहदी भी फीकी नहीं पड़ी थी कि खुशियां छिन गईं। पिता संजय द्विवेदी कहते हैं कि बेटे के जाने के बाद जिंदगी जैसे थम गई है। परिवार चाहता है कि शुभम को ‘बलिदानी’ का दर्जा मिले या कम से कम ऐसा सम्मान मिले, जिससे उसकी यादें जिंदा रह सकें।
विनय पर गर्व और गम
करनाल के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल का परिवार आज भी उस दिन को भूल नहीं पाया है। पिता राजेश नरवाल की आंखें बेटे को याद करते ही भर आती हैं। उनका कहना है कि विनय ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया, लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब आतंकवाद खत्म होगा। परिवार चाहता है कि विनय के नाम पर कोई अस्पताल या शिक्षण संस्थान बने, ताकि उनका नाम समाज सेवा के जरिए हमेशा जिंदा रहे। विनय की बहन सृष्टि ने यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी है, ताकि भाई के सपनों को आगे बढ़ा सके। वहीं उनकी पत्नी हिमांशी अब गुरुग्राम में अपने माता-पिता के साथ रह रही हैं। हर साल विनय के जन्मदिन पर परिवार रक्तदान शिविर आयोजित करता है। यह उनके लिए श्रद्धांजलि भी है और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का एक तरीका भी।
यादों को बना लिया सहारा
इंदौर के सुशील नथानियल का परिवार भी इस हमले का शिकार हुआ। वह एलआईसी में अधिकारी थे। उनके जाने के बाद परिवार ने हिम्मत नहीं हारी, लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं। पत्नी सरकारी शिक्षक हैं और बेटी नौकरी कर रही है, फिर भी परिवार बेटे के लिए अनुकंपा नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठा है, जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई। हमले के बाद जम्मू-कश्मीर और असम सरकार की ओर से आर्थिक मदद जरूर दी गई, लेकिन परिवारों का मानना है कि यह नुकसान किसी भी कीमत पर पूरा नहीं हो सकता। उनके लिए सबसे बड़ी मांग यही है कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों और आतंकवाद का पूरी तरह खात्मा हो।
पहलगाम हमले को एक साल बीत चुका है, लेकिन उस दिन का दर्द आज भी ताजा है। जिन लोगों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए हर दिन एक नई चुनौती है। देश भले आगे बढ़ रहा हो, लेकिन इन परिवारों की जिंदगी अब भी उस एक दिन पर ठहरी हुई है, जिसे वे चाहकर भी कभी नहीं भूल सकते।
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