Jamsetji Tata : 3 मार्च 1839 को गुजरात के नवसारी में जन्मे Jamsetji Tata ने जिस कारोबारी विरासत की नींव रखी, वह आज दुनिया के सबसे बड़े बिजनेस समूहों में गिनी जाती है। 158 साल पहले शुरू हुआ यह सफर अब 100 से ज्यादा देशों में फैले कारोबार तक पहुंच चुका है। 2024-25 में समूह का रेवेन्यू 16,50,471 लाख करोड़ रुपये और 31 मार्च 2025 तक मार्केट कैपिटल 30,07,525 करोड़ रुपये दर्ज की गई लेकिन इसकी शुरुआत महज 21 हजार रुपये से हुई थी।
जमशेदजी के पिता नुसरवानजी टाटा पारसी परंपरा से अलग हटकर व्यापार में उतरने वाले परिवार के पहले सदस्य थे। धार्मिक सेवा की विरासत के बीच उन्होंने कारोबार की राह चुनी। यही सोच आगे चलकर बेटे के लिए प्रेरणा बनी।
Jamsetji Tata ने 21 हजार रुपये से की थी शुरुआत
कम उम्र में ही जमशेदजी मुंबई पहुंचे और एलफिंस्टन कॉलेज से 1858 में ‘ग्रीन स्कॉलर’ के रूप में शिक्षा पूरी की। पढ़ाई ने उनमें आधुनिक सोच और वैश्विक नजरिया विकसित किया। 1868 में, मात्र 29 वर्ष की उम्र में, जमशेदजी ने 21 हजार रुपये की पूंजी से एक ट्रेडिंग कंपनी शुरू की। यही छोटी सी पहल आगे चलकर Tata Group की आधारशिला बनी। उस दौर में अंग्रेजी शासन के कारण भारतीय उद्यमियों के लिए माहौल अनुकूल नहीं था, फिर भी उन्होंने जोखिम उठाया और इंग्लैंड की यात्रा कर नए अवसर तलाशे।
नागपुर की मिल से बदली तस्वीर
1874 में उन्होंने मुंबई की बजाय नागपुर में टेक्सटाइल मिल शुरू करने का फैसला लिया। ‘एम्प्रेस मिल्स’ का प्रयोग न सिर्फ कारोबारी दृष्टि से सफल रहा, बल्कि कर्मचारियों की भलाई के लिए नई मिसाल भी बना। उस दौर में श्रमिकों के हितों को ध्यान में रखने वाली सोच दुर्लभ थी। जमशेदजी ने इसे अपनी नीति का हिस्सा बनाया। 1892 में उन्होंने भारतीय छात्रों के लिए ‘जेएन टाटा एंडोमेंट’ की शुरुआत की, ताकि वे विदेश जाकर उच्च शिक्षा हासिल कर सकें। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए मील का पत्थर साबित हुई। 1903 में मुंबई में Taj Mahal Palace होटल की स्थापना ने भारतीय आतिथ्य उद्योग को नई पहचान दी। उस समय यह एशिया के सबसे भव्य होटलों में गिना जाता था।
Remembering our Founder Jamsetji Nusserwanji Tata on his 187th birth anniversary.
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— Tata Group (@TataCompanies) March 3, 2026
विरासत आगे बढ़ाने वाले उत्तराधिकारी
1904 में जर्मनी में जमशेदजी का निधन हो गया, लेकिन उनका सपना यहीं नहीं रुका। उनके बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा ने जिम्मेदारी संभाली और समूह को नए क्षेत्रों में आगे बढ़ाया। आने वाले दशकों में स्टील, ऑटोमोबाइल, आईटी और कई अन्य सेक्टर में कदम रखते हुए टाटा ग्रुप ने वैश्विक पहचान बनाई। आज जब टाटा नाम भरोसे और गुणवत्ता का प्रतीक बन चुका है, तब यह याद करना जरूरी है कि इसकी शुरुआत एक युवा उद्यमी के साहस, दूरदृष्टि और 21 हजार रुपये के विश्वास से हुई थी।
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